शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० १, अ० ७, ब्रा० २, क० १७-२६ शतपथब्राह्मण / १३६
हैं—'हुवे' (मैं बुलाता हूँ), 'हवामहे' (हम बुलाते हैं), 'आगच्छ' (आ), 'इदं बर्हिः सीद' (इस
आसन पर बैठो)। क्योंकि इन शब्दों द्वारा बुलाता है, याज्य से देता है, इसलिये याज्य में ऐसे
शब्द आते हैं—'वीहि हविः' (हवि को स्वीकार करो), 'जुषस्व हविः' (हवि को ग्रहण करो),
'आवॄषा यस्व' (ग्रहण करो), 'अद्धि' (खाओ), 'पिब' (पियो), 'प्र' (वहाँ), क्योंकि इसी
(याज्या) द्वारा तो वह उसको देता है जो 'प्र' अर्थात् दूर हैं ॥१७॥
अनुवाक्य को 'पुरस्ताल्लक्षण' अर्थात् आदि में सामने लक्षणवाला होना चाहिए। वह
(द्यौ) ही अनुवाक्य हैं और उस (द्यौ) के नीचे के चिह्न हैं—चाँद, नक्षत्र (सूर्य) ॥१८॥
'याज्य' को 'उपरिष्टाल्लक्षण' अर्थात् ऊपर लक्षणवाला होना चाहिए। याज्य यही
(पृथिवी) है और इसके ऊपर के लक्षण हैं-ओषधि, वनस्पति, जल, अग्नि और यह प्रजा ॥१९॥
वही अनुवाक्य श्रेष्ठ होता है जिसके पहले पद में देवता का नाम आता है। याज्य वही
श्रेष्ठ होती है जिसके अन्तिम पद में देवता के लिए वषट् किया जाता है। देवता ऋक् ही वीर्य
है। मानो दोनों ओर से बल से पकड़कर हवि को उस देवता के अर्पण करता है जिसके लिए वह
हवि होता है ॥२०॥
अब कहता है 'वौक्'। वाणी ही वषट्कार है। वाणी ही वीर्य है। इस प्रकार वह वीर्य-
सिंचन करता है। फिर कहता है 'षट्', क्योंकि छः ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं में
हीं वीर्य-सिंचन करता है। ऋतुओं से सींचा हुआ यह वीर्य इन प्रजाओं को उत्पन्न करता है,
इसलिये वषट् करता है ('वषट्' के दो भाग हैं—'व' और 'षट्') ॥२१॥
अब प्रजापति की दोनों सन्तान देव और असुर अपने पिता के दायभाग अर्थात् दोनों
अर्द्धमासों (पक्षों) को प्राप्त हुए। जो बढ़ता है उसको देव, जो घटता है उसको असुर ॥२२॥
देवों ने चाहा कि किस प्रकार उस भाग को भी ले लें जिसको असुर लिये हुए हैं। वे
पूजा और परिश्रम करते रहे। उन्होंने इस हविर्यज्ञ अर्थात् दर्शपूर्णमास यज्ञ को देखा और
उनको किया। इनको करके उन्होंने उस एक को ले लिया— ॥२३॥
जो असुरों का था। जब ये दोनों चलते हैं तो महीना होता है। महीने से साल होता
है। संवत्सर का अर्थ है 'सब'। इसलिये इस प्रकार देवों ने असुरों का सब लेकर मानो अपने शत्रु
असुरों का सब ले लिया। इस प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है अपने शत्रुओं का
सब-कुछ ले लेता है। अपने शत्रुओं को सबसे वंचित कर देता है ॥२४॥
जो देवों का अर्द्धमास था उसे 'यवा' कहते हैं, क्योंकि देव उससे युक्त थे ('यु' का अर्थ
हैं जुड़ना)। जो असुरों का था उसे 'अयवा' कहते हैं, क्योंकि असुर उससे युक्त न रह सके ॥२५॥
परन्तु अन्यथा भी कहते हैं। जो देवों का था उसे 'अयवा' कहते हैं, क्योंकि असुर उसको
न ले सके, और जो असुरों का था उसे 'यवा' कहते हैं क्योंकि देवों ने उसे ले लिया। दिन को
'सब्द' कहते हैं, रात्रि को 'सागरा', महीने को 'ग्रव्य', और वर्ष को 'सुमेक'। 'स्वेक' ही 'सुमेक'