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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 147 of 699

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Page 147

कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, कं० १५-२१ शतपथब्राह्मण / १२६
चन्द्रमा अमावस्या के दिन वनस्पति और जल में मिल जाता है)। यह जो सोम राजा देवों का
भोजन है वह चन्द्रमा ही है। यह जो (अमावश्या की) रात को न पूर्व में दीखता है न पश्चिम में,
वह इस लोक में आ जाता है और जलों और ओषधियों में मिल जाता है। अब ओषधियों और
जलों से इकट्ठा करके उसे आहुतियों से उत्पन्न करते हैं, और यह आहुतियों से उत्पन्न होकर
पश्चिम में दीखता है। तात्पर्य यह है कि अमावस्या के दिन चांद आकाश में नहीं रहता, किन्तु
पृथिवीलोक में वनस्पति और जल में प्रविष्ट हो जाता है। यज्ञ करनेवाला वनस्पति और जल
के बने हुए दूध से आहुति बनाता है और उस आहुति से चाँद को उत्पन्न करता है; वही चाँद
दूसरे दिन पश्चिम में चमकता है ॥१५॥
यह इस प्रकार होता है। देवों का न क्षीण होनेवाला अन्न ही (मनुष्यों तक) आ सकता
है। इसलिए पुरुष इस रहस्य को समझता है। वह इस लोक में अक्षय्य अन्न को प्राप्त होता और
परलोक में पुण्य को पाता है ॥१६॥
इस प्रकार उस (अमावस्या की) रात को अन्न देवों से चलता है और इस लोक में
आता है। अब देवों ने चाहा कि वह फिर उनके पास कैसे वापस जाय और किस प्रकार नष्ट
न हो जाय, इसलिए (ये देव) उन पर विश्वास रखते हैं जो सान्नाय्य आहुति को (दूध और
दही मिलाकर) तैयार करते हैं, क्योंकि जब यह तैयार करेंगे तो अवश्य ही देंगे। जो इस रहस्य
को जानता है उस पर अपने और पराये सभी विश्वास करते हैं, क्योंकि जो बड़प्पन को प्राप्त
हो जाता है उस पर सभी विश्वास करते हैं ॥१७॥
अब यह जो तपता है (अर्थात् सूर्य) वही इन्द्र है। और जो चन्द्रमा है वही वृत्र है, परन्तु
वह इसका शत्रु-सा है। इसलिए यद्यपि इस रात को पहले बहुत दूर उदय होता है, फिर भी उसकी
ओर को तैरता है और उसके (सूर्य के) मुंह में घुस जाता है ॥१८॥
(सूर्य) उस (चाँद) को ग्रस के उदय होता है। वह न पूर्व में दीखता है न पश्चिम में।
जो इस रहस्य को जानता है वह अपने अहितकारी शत्रु को ग्रस लेता है और उसके लिए
लोग कहते हैं कि वही वह है, उसके शत्रु हैं ही नहीं ॥१९॥
(सूर्य) उस (चाँद) को चूसकर फेंक देता है, और वह चूसा हुआ पश्चिम में दीखता
है। यह फिर बढ़ता है। वह (उसी सूर्य के) भोजन के लिए फिर बढ़ता है। जो इस रहस्य को
समझता है उसका अहितकारी शत्रु यदि व्यापार या अन्य किसी उपाय से बढ़ता भी है तो फिर
उसी का भोजन बनने के लिए बढ़ता है ॥२०॥
कुछ लोग महेन्द्र के नाम से (आहुति देते हैं), क्योंकि वृत्र के वध से पहले वह इन्द्र
था। वृत्र को मारकर महेन्द्र हो गया, जैसे विजय के पश्चात् राजा महाराजा हो जाता है।
इसलिए महेन्द्र के लिए (आहुति देते हैं); परन्तु इन्द्र के लिए ही दी जानी चाहिये। वह वृत्र
के वध से पहले भी इन्द्र ही था, वृत्र के मारने के पीछे भी इन्द्र ही रहा। इसलिए इन्द्र के लिए
ही आहुति देवें ॥२१॥
अध्याय ७-ब्राह्मण १
(अध्वर्यु) पलाश की शाखा द्वारा बछड़ों को (गायों से) अलग करता है। वह पलाश
की शाखा से बछड़ों को अलग करता है। जब गायत्री सोम की ओर उड़ी तो (सोम को) लिये
जाते हुए (उस गायत्री के) एक पैर-रहित निशानेबाज ने तीर चलाया और एक पर्ण (पंख)
काट लिया, या तो गायत्री का या सोम का। वह गिरकर पलाश हो गया। इसलिए उसका
नाम पर्ण हुआ। अब वह सोचता है कि जैसे यह सोम की प्रकृति वाला था उसी प्रकार यह यहाँ