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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 115 of 699

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Page 115

कां० १, अ० ५, ब्रा० २, क० ६-१८ शतपथब्राह्मण / ६७
'अच्छा', और वह लौट आया। वह जो लौट आया उससे देवों ने यज्ञ किया। जिससे वह यज्ञ
किया उसी के कारण वे देव हुए ॥६॥
जब वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र को) बुलाता है तो मानो यज्ञ को बुलाता है 'सुनो, लौटो',
और जब (अग्नीध्र) उत्तर देता है तो मानो यज्ञ ही 'अच्छा' कहकर लौटता है। इस प्रकार उस
लौटे हुए यज्ञ से बीज के समान ऋत्विज लोग परोक्ष रीति से यजमान तक सम्प्रदाय चलाते हैं।
जैसे लोग एक भरे हुए पात्र को एक से दूसरे को देते हैं, इसी प्रकार ऋत्विज लोग सम्प्रदाय चलाते
हैं (अर्थात् यज्ञ की प्रथा को एक-दूसरे तक पहुँचाते हैं)। वाणी के द्वारा सम्प्रदाय चलता है।
वाणी ही यज्ञ है। वाणी ही बीज है। इसीलिए वाणी द्वारा सम्प्रदाय चलता है ॥७॥
जब (अध्वर्यु ने होता से कहा) कि 'अनुब्रूहि'—'बोलो', तो इसके पीछे न तो अध्वर्यु
ही कुछ अपशब्द कहे और न होता ही अपशब्द कहे। अध्वर्यु कहता है इस प्रकार अग्नीध्र तक
यज्ञ को ले जाता है ॥८॥
अग्नीध्र उत्तर देने के समय तक कुछ अपशब्द न कहे। अग्नीध्र उत्तर देता है। इस प्रकार
यज्ञ अध्वर्यु तक पहुँचता है ॥६॥
अध्वर्यु उस समय तक कुछ अपशब्द न कहे जब तक (नीचे का शब्द) न बोले 'यज'—
'यज्ञ करो'। 'यज' शब्द कहने से अध्वर्यु यज्ञ को होता तक ले जाता है ॥१०॥
होता उस समय तक अपशब्द न बोले जब तक वषट्कार न कहे। वषट्कार से वह यज्ञ
को अग्नि में सींचता है जैसे योनि में वीर्य सींचा जाता है, क्योंकि अग्नि यज्ञ की योनि है। यज्ञ
अग्नि से ही उत्पन्न होता है। अब हविर्यज्ञ और सोम-यज्ञ—में॥११॥
(सोम को) लेने के पश्चात् उपाकरण तक अध्वर्यु कोई अपशब्द न कहे। 'उपावर्त्तध्वम्'—
'निकट आइये।' ऐसा कहकर अध्वर्यु उद्गाताओं के लिए यज्ञ को देता है ॥१२॥
उत्तम अर्थात् सबसे पिछली ऋचा बोलने तक उद्गाता लोगों को कोई अपशब्द नहीं
बोलने चाहिएँ। 'एषोत्तमा'—'यह अन्तिम ऋचा है।' ऐसा कहकर उद्गाता लोग यज्ञ को होता
को देते हैं ॥१३॥
होता वषट्कार तक कोई अपशब्द न बोले। वषट्कार से अग्नि में उसी प्रकार सिंचन
किया जाता है जैसे योनि में वीर्य का। अग्नि यज्ञ की योनि है, क्योंकि वह वहीं से उत्पन्न होता
हैं ॥१४॥
यदि जिसके पास यज्ञ लौटता है वह अपशब्द कह दे तो वह उसी प्रकार यज्ञ को बरबाद
कर देता है जैसे (जल से) पूरे भरे हुए पात्र को (नीचे फेंक देने से जल बरबाद जाता है)। जहाँ
ऋत्विज लोग परस्पर एक-दूसरे को समझते हुए यज्ञ करते हैं वहाँ सब काम ठीक होता है, कोई
गलती नहीं होती। इसलिए यज्ञ का इसी प्रकार भरण करना चाहिए ॥१५॥
ये पाँच व्याहृतियाँ होती हैं—(१) ओ ! श्रावय, 'सुनाओ या पुकारो।' (२) अस्तु
श्रौषट्, 'वह सुने।' (३) यज, 'समिधा को प्रज्वलित करो।' (४) ये यजामहे, 'हम यज्ञ करते
हैं।' (५) वौषट्, 'ले जावे।' पांच प्रकार का यज्ञ होता है, पांच प्रकार का पशु, वर्ष की पांच
ऋतुएं भी होती हैं। यह यज्ञ की मात्रा है। यह उसकी सम्पत् या पूर्णता है ॥१६॥
इनमें सत्रह अक्षर होते हैं। प्रजापति सत्रह प्रकार का है। प्रजापति ही यज्ञ है। यह यज्ञ
की मात्रा है। यह यज्ञ की पूर्णता है ॥१७॥
'ओ श्रावय' से देव पूर्व की वायु को चलाते हैं। 'अस्तु श्रौषट्' से बादलों को लाते हैं,