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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० १ ; अ० ५, ब्रा० १, कं० १५-२५ शतपथब्राह्मण / ६३
लिए)। इस प्रकार वह देवों को और अग्नि को दोनों को प्रसन्न करता है। जब पहले 'अग्नि' कहा
तो अग्नि को प्रसन्न किया, और जब 'देवताओं का होता' कहा तो देवताओं को प्रसन्न
किया ।।१५।।
अब कहता है-“सह पित्रा वैश्वानरेण”-“वैश्वानर पिता के साथ ।” संवत्सर ही पिता
वैश्वानर तथा प्रजापति है। इस प्रकार वह संवत्सर अर्थात् प्रजापति को प्रसन्न करता है। अब
कहता है-“अग्ने पूषन् बृहस्पते प्र च वद प्र च यज”-“हे अग्नि ! हे पूषा ! हे बृहस्पति ! बोल
और यज्ञ कर ।” इस प्रकार बोलने से ही यज्ञ होता है। इसलिए इन देवताओं को प्रसन्न करता
है कि 'तुम बोलो, तुम यज्ञ करो' ॥१६॥ यहाँ ४०० पूरे हुए ।।
'वसुओं की कृपा के हम पात्र हों । रुद्रों का वैभव हम में आवे । अदिति अर्थात् पूर्णता
के लिए और स्वतन्त्रता के लिए आदित्यों के प्रिय होवें ।' ये तीन देवता हैं वसु, रुद्र और आदित्य ।
इस कथा का प्रयोजन यह है कि 'हम इन देवताओं के संरक्षण में रहें' ॥१७॥
अब कहता है-“जुष्टामद्य देवेभ्यो वाचमुद्यासम्”-“मैं आज देवताओं की प्रिय वाणी
बोलूं ।” इसका तात्पर्य यह है कि जो वाणी देवताओं को पसन्द हो वह बोलूं। देवताओं के लिए
प्रिय जो वाणी है उसका बोलना समृद्धि का हेतु है ॥१८॥
अब कहता है-“जुष्टां ब्रह्मभ्यः” अर्थात् ‘ऐसी वाणी बोलूं जो ब्राह्मणों को प्रिय है ।”
इसका तात्पर्य यह है कि देवताओं के प्रिय जो वाणी हो उसको बोलूं, क्योंकि ब्राह्मणों के प्रति
जो वाणी प्रसन्न हो उसका बोलना समृद्धि का कारण होता है ॥१९॥
अब कहता है-“जुष्टां नराशꣳसाय” अर्थात् ‘ऐसी वाणी बोलूं जो नराशंस के लिए
प्रिय हो ।” प्रजा ही नर हैं, इसलिए वह यह समस्त प्रजा के लिए कहता है। इससे समृद्धि होती
है। चाहे समझे चाहे न समझे, यही कहा जाता है, 'खूब कहा ! खूब कहा ! ' जो कुछ होता की
टेढ़ी निगाह से छूट जाये उसको अग्नि वापस लावे, क्योंकि अग्नि जातवेद (प्राणियों को जानने-
वाला) और विचर्षण (बुद्धिमान्) है। “ये जो तीन अग्नियां पहले होता के लिए चुनी गई थीं
वे चली गईं। यह चौथी अग्नि जो चुनी गई है वह उस सब की पूर्ति करे जो छूट गया हो ।” ऐसा
कहता है और इससे त्रुटि की पूर्ति हो जाती है ॥२०॥
अब वह अध्वर्यु और अग्नीध्र को छूता है। अध्वर्यु मन है और होता वाणी है। इस प्रकार
वह मन और वाणी में मेल कराता है ॥२१॥
अब जाप कराता है-'छः उर्वियां पाप से रक्षा करें'-अग्नि, पृथिवी, जल, वायु, दिन और
रात्रि । ऐसा कहने से तात्पर्य यह है कि ये देवता आर्त अर्थात् रोग से मेरी रक्षा करें। उस पुरुष
की कभी अवहेलना नहीं होती जिसकी देवता रोग से रक्षा करते हैं ॥२२॥
अब होता के आसन तक जाता है और होता के आसन में से एक तृण निकालकर फेंकता
है और कहता है-“निरस्तः परावसुः”-“परावसु भगा दिया गया ।” परावसु (पराया माल खाने-
वाला) असुरों का होता था। वह उसको होता के आसन से निकालकर फेंक देता है ॥२३॥
अब वह 'होता' के आसन पर बैठता है यह कहकर-“इदमहमर्वावसोः सदने सीदामि”-
“मैं अर्वावसु के आसन पर बैठता हूँ ।” अर्वावसु (धन न चाहनेवाला) देवताओं का होता
इसलिए वह उसी के आसन पर बैठता है ॥२४॥
अब वह जपता है-“विश्वकर्मंस्तनूपा असि मा मो दोषिष्टं मा मा हिꣳसिष्टम् । एष
वां लोकः”-“हे विश्वकर्मा, तू शरीर की रक्षा करनेवाला है। हे दोनों अग्नियो, मुझे न जलाओ !
मुझे न सताओ ! यह तुम दोनों का लोक है ।” ऐसा कहकर वह कुछ उत्तर की ओर बढ़ जाता है।