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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 103

कां० १, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / ८५
स्पष्ट नहीं है। और जो कृत्य चुपके से किया जाता है वह भी स्पष्ट नहीं होता ॥५॥
और जो आहुति वाणी के लिए देता है उसे मन्त्र पढ़कर देता है, क्योंकि वाणी स्पष्ट है
और मन्त्र भी स्पष्ट है ॥६॥
जो आहुति मन के लिए देता है वह बैठकर देता है, और जो वाणी के लिए देता है वह
खड़े-खड़े। मन और वाणी दोनों मिलकर ही देवों के लिए यज्ञ ले जाते हैं। बैलों के जोड़े में से
अगर एक बैल छोटा होता है तो उसके कन्धे पर 'उपवह' अर्थात् गद्दी रख देते हैं (जिससे जुए के
दोनों बैल बराबर हो जायें)। वाणी तो मन से छोटी है ही। मन बड़ा अपरिमित है, वाणी बहुत
परिमित है। वाणी के लिए खड़े होकर आहुति देने का तात्पर्य यह है कि वाणी को एक 'उपवह'
अर्थात् गद्दी दे दी जिससे वे दोनों बराबर होकर यज्ञ को देवों तक ले जायें ॥७॥
जब देवों ने यज्ञ रचा तो असुर राक्षसों के विघ्न से डरने लगे। इसलिए वे (वेदि के)
दक्षिण की ओर सीधे खड़े हो गये। सीधे खड़े होने से बल आता है, इसलिए दक्षिण की ओर
खड़े होकर आहुति देता है। और जो दोनों ओर आहुति देता है इससे वह जुड़े हुए मन और
वाणी को अलग-अलग कर देता है। दोनों आहुतियों में से एक यज्ञ का सिर है, दूसरी यज्ञ का
मूल है ॥८॥
उस आहुति को जो यज्ञ का मूल है स्रुवा से देता है। और जो यज्ञ का शिर है उसे स्रुक्
से देता है ॥६॥
जो आहुति यज्ञ का मूल है उसे चुपके (बिना बोले) देता है, क्योंकि मूल (जड़) मौन-सी
होती है क्योंकि इसको वाणी नहीं बोलती ॥१०॥
जो आहुति यज्ञ का शिर है उसको मन्त्र पढ़कर देता है, क्योंकि वाणी ही मन्त्र है और
शिर से ही यह वाणी बोलती है ॥११॥
जो आहुति यज्ञ का मूल है उसे बैठकर ही देता है, क्योंकि मूल (जड़) बैठी-सी ही होती
है। जो आहुति यज्ञ का शिर है उसे खड़े होकर ही देता है। शिर खड़ा-सा होता है ॥१२॥
स्रुवा से पहली आहुति को देकर कहता है—'अग्निमग्नीत् सम्मृड्ढि'—'हे अग्नीत्, आग
को साफ कर दो।' जैसे धुरे को जुआ पर रखते हैं ऐसे ही वह पहली आहुति देता है, क्योंकि धुरा
रखकर ही बैलों को जुए से बाँधते हैं ॥१३॥
(अग्नीध्र) आग को साफ करता है (ऊपर से राख को अलग कर देता है) मानो वह
जुए को बाँधता है जिससे वह बँधकर यज्ञ को देवों के लिए ले जाय। इसीलिए साफ करता है।
साफ करने में वह आग को घुमाता अर्थात् कुरेदता है, क्योंकि जब बैलों को जुए से बाँधते हैं तो
घुमाकर ले जाते हैं। तीन बार कुरेदता है क्योंकि यज्ञ तिहरा है ॥१४॥
कुरेदने में वह यह मन्त्र पढ़ता है—"अग्ने वाजजिद् वाजं त्वा सरिष्यतं वाजजित्७
सम्मार्ज्म'" (यजुर्वेद २।७)—"हे अन्न जीतनेवाली आग ! तुझ अन्न को जीतनेवाली को, जो
अन्न तक जा रही है मैं कुरेद रहा हूँ।" इसका तात्पर्य है कि मैं उस आग को कुरेद रहा हूँ जो यज्ञ
को ले जा रही है और जो यज्ञ के योग्य है। चुपके-चुपके तीन बार कुरेदता है। जैसे बैलों को
जोड़कर हाँकते हैं, 'चलो, ले चलो।' इसी प्रकार इसको भी (अर्थात् आग को भी) हाँकते हैं,
'चलो, देवों के लिए यज्ञ ले चलो।' इसलिए तीन बार चुपके-चुपके कुरेदता है। और जैसे दो
आहुतियों को बीच में कुरेदने का काम करने से दोनों आहुतियाँ एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं,
इसी तरह से मन और वाणी मिले होकर भी एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं ॥१५॥