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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished356 pages

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पुस्तक-परिचय
शार्ङ्गधरसंहिता में उपलब्ध विषयवस्तु का
अधिकांश संग्रह चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन
संहिताओं से और कुछ रसशास्त्र के
प्रतिनिधि ग्रन्थों से किया गया है।
शार्ङ्गधरसंहिता में चरक, सुश्रुत आदि
संहिता ग्रन्थों के अतिरिक्त चक्रदत्त तथा
सोढल का प्रभाव भी परिलक्षित होता है।
इसमें रसशास्त्र-सम्बन्धी सामग्री पूर्ववर्ती
विभिन्न रसशास्त्रीय ग्रन्थों से ली गयी प्रतीत
होती है। इस प्रकार आर्षसंहिताओं के
सारभूत तथा प्रकरणोचित विषयों का इसमें
संग्रह होने के कारण आज भी समाज में
प्रस्तुत संहिता का आदर प्राचीन आयुर्वेदीय
संहिताओं की भाँति ही देखा जाता है।
आयुर्वेदीय ग्रन्थों की टीका करते समय इस
बात का विशेष ध्यान देने की आवश्यकता
होती है कि पद्यों द्वारा जितना विषय कहा
गया है क्या वह प्रायोगिक दृष्टि से पर्याप्त
है? अथवा उसे और भी स्पष्ट करने की
आवश्यकता है? प्रस्तुत दीपिका
हिन्दीटीका में इस दृष्टि से पूरा-पूरा ध्यान
दिया गया है। आप किसी भी योग का
निर्माण इसमें दी गयी टीका तथा वक्तव्यों
की सहायता से सरलतापूर्वक कर सकते हैं।
योगों के निर्माण में कहाँ किस प्रकार की
अड़चनें आती हैं, कैसे उनका निराकरण
किया जाता है, किस प्रकार की सावधानियाँ
रखनी चाहिए, कौन द्रव्य किसमें अतिरिक्त
ग्राह्य है और कौन त्याज्य है, शास्त्रोक्त न
होने पर भी किस योग में कौन-सा कार्य
विशेष रूप से किया जाता है, परम्परागत
योगों में क्या-क्या विशेष कर्तव्य होते हैं,
इस प्रकार की सभी बातों पर भी इस टीका
में विशेष ध्यान दिया गया है; यही इसका
मौलिक स्वरूप है। वक्तव्य तथा विशेष
वक्तव्य आदि में जो कुछ जहाँ कहा गया है,
वह लेखक के चिरकालीन चिकित्सा एवं
औषधनिर्माण-सम्बन्धी अनुभवों का
सारसमुच्चय है।

-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA