Skip to content
SarvaKosh
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished356 pages

Page 184 of 356

Read in context
Page 184

148 शाङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
वाला है। इसके सेवन से शुक्र की वृद्धि होती है और दुर्बल
इन्द्रियों वाले मनुष्य का उचित रूप से पोषण होता है। इसके
सेवन से मनुष्य सब रोगों से रहित हो जाता है और ऐसा पुष्ट
होता है जैसा जल से सींचा हुआ वृक्ष। इस घृत का नाम
'कामदेव' है, जो अत्यन्त गुणवान् है।
वक्तव्य- इस पाठ में-'पचेच्चैव घृताढकम्' तथा
'घृताढकं विपाचयेत्' दो बार कहा गया है। इसमें सन्देह
करने की आवश्यकता नहीं, घृत एक ही आढक डालना
चाहिये। यह योग चक्रदत्त रक्तपित्ताधिकार में भी है, जिसको
देखने से आपके सन्देह की निवृत्ति हो जायेगी।
पानीयकल्याणक घृत
त्रिफला द्वे निशे कौन्ती सारिवे द्वे प्रियङ्गुका।
शालिपर्णी पृश्निपर्णी देवदार्व्येलवालुकम्।। 38।।
नतं विशाला दन्ती च दाडिमं नागकेशरम्।
नीलोत्पलैला मञ्जिष्ठा विडङ्गं कुष्ठपद्मकम्।। 39 ।।
जातिपुष्पं चन्दनं च तालीसं बृहती तथा।
एतैः कर्षसमैः कल्कैर्जलं दत्त्वा चतुर्गुणम्।। 40 ।।
घृतप्रस्थं पचेद्धीमानपस्मारे ज्वरे क्षये।
उन्मादे वातरक्ते च कासे मन्दानले तथा।। 41 ।।
प्रतिश्याये कटीशूले तृतीयक-चतुर्थके।
मूत्रकृच्छ्रे विसर्पे च कण्डूपाण्ड्वामये तथा।। 42 ।।
विषद्वये प्रमेहेषु सर्वथैवोपयुज्यते।
वन्ध्यानां पुत्रदं भूतयक्षरक्षोहरं स्मृतम् ।। 43 ।।
हरड़, बहेड़ा, आँवला, दारूहल्दी, हल्दी, सम्भालू के
बीज अथवा पत्ते, सारिवा, कृष्णसारिवा, प्रियंगु, शालपर्णी,
पिठवन, देवदारु, एलुवा (सुगन्धित द्रव्य), तगर, इन्द्रायण
की जड़, दन्ती, अनारदाना, नागकेसर, नीलकमल, इलायची,
मजीठ, वायविडंग, कूठ, पद्मकाठ, जाती (चमेली) के फूल,
सफेद चन्दन, तालीस पत्र तथा बनभण्टा की जड़ इन सबको
एक-एक तोला लेकर तथा कल्क बनाकर एक प्रस्थ (तीन
पाव चार तोला) घृत में डाल दें और घी से चौगुना जल
डालकर विधिपूर्वक पाक करे। तैयार होने पर इसका प्रयोग
अपस्मार (मिरगी), ज्वर (जीर्णज्वर), क्षय (यक्ष्मा), उन्माद,
वातरक्त, कास, मन्दाग्नि, प्रतिश्याय, कमर की पीड़ा, तृतीयक
एवं चतुर्थक ज्वर, मूत्रकृच्छ्र, खुजली, पाण्डुरोग स्थावर तथा
जंगम विष और प्रमेहों में किया जाता है। यह घृत बन्ध्याओं
को पुत्र देता है और भूत, यक्ष तथा राक्षसों को हरता है।
वक्तव्य- भूत, यक्ष तथा राक्षसों के आवेश से जो उन्माद
आदि रोग हो जाते हैं, उनमें इसका प्रयोग करना चाहिये।
बन्ध्याओं के गर्भाशय तथा डिम्ब के विकारों को दूर करके
यह गर्भाधान शक्ति देता है।
अमृता घृत
अमृताक्वाथकल्काभ्यां सक्षीरं विपचेद् घृतम्।
वातरक्तं जयत्याशु कुष्ठं जयति दुस्तरम्।। 44 ।।
गिलोय का क्वाथ तथा कल्क करके दुग्ध सहित घृत
का परिपाक कर लें। यह घृत वातरक्त तथा दुःसाध्य कुष्ठ को
जीतता है।
वक्तव्य- इस घृत में द्रव्यों के परिमाण का उल्लेख नहीं
किया गया है, अतः इसका पाक इस प्रकार करना चाहिये-घृत
एक सेर गुडूची कल्क एक पाव, गुडूची क्वाथ तीन सेर और
दुग्ध एक सेर। यहाँ चरक तथा सुश्रुत का भी मत है।
महापञ्चतिक्त घृत
सप्तच्छदः प्रतिविषा शम्याकः कटुरोहिणी।
पाठा मुस्तमुशीरं च त्रिफला पर्पयस्तथा।। 45 ।।
पटोलनिम्बमञ्जिष्ठाः पिप्पली पद्मकं शठी।
चन्दनं धन्वयासश्च विशाले द्वे निशे तथा।। 46 ।।
गुडूची सारिवे द्वे च मूर्वा वासा शतावरी।
त्रायन्तीन्द्रयवा यष्टी भूनिम्बश्चाक्षभागिकाः ।। 47 ।।
घृतं चतुर्गुणं दद्याद् घृतादामलकीरसः।
द्विगुणः सर्पिषश्चात्र जलमष्टगुणं भवेत्।। 48 ।।
तत्सिद्धं पाययेत् सर्पिर्वातरक्तेषु सर्वथा।
कुष्ठानि रक्तपित्तं च रक्तांशांसि च पाण्डुताम्।। 49 ।।
हृद्रोगगुल्मवीसर्पप्रदरं गण्डमालिकाम्।
क्षुद्ररोगान् ज्वराँश्चैव महातिक्तामिदं जयेत् ।। 50 ।।
छतिवन, अतीस, अमलतास की गुद्दी, कुटकी, पाठा,
नागरमोथा, खस, हरड़, बहेड़ा, आँवला, पित्तपापड़ा, परवल
की पत्ती, नीम की छाल, मजीठ, पीपल, पद्मकाठ, कचूर,
सफेद चन्दन, धमासा, इन्द्रायण का जड़, हल्दी, दारूहल्दी,
गिलोय, सारिवा, कृष्णसारिवा, मरोड़फली, अडूसा, शतावर,
त्रायमाणा, इन्द्रजौ, मुलहठी तथा चिरायता-ये सब द्रव्य 1-1
तोला, सभी द्रव्यों से चौगुना (1 सेर 9 छटाँक 3 तोला) घृत,
घी से दुगुना आँवला का स्वरस और घी से आठ गुना जल।
औषधियों का कल्क बनाकर सब वस्तुओं को एक साथ
मिलाकर परिपाक करे, तैयार होने पर छानकर रख लें। इस