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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

by शार्ङ्गधराचार्य

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished356 pages

Page 183 of 356

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Page 183

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 147
शनैः शनैर्विपक्तव्यं चाङ्गेरीघृतमुत्तमम्।
तद्घृतं कफवातघ्नं ग्रहण्यर्शोविकारनुत् ।। 24 ।।
हन्त्यानाहं गुदभ्रंशं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् ।
पीपल, पीपलामूल, चीता की जड़, गजपीपल, गोखरू,
साँठ, धनियाँ, पाठा, बेलगिरी तथा अजवायन-इन द्रव्यों को
एक-एक पल (4-4 तोला) लेकर कल्क बना लें। घी चौंसठ
पल (3 सेर 16 तोला), घी से चौगुना (12 सेर 3 पाव 4
तोला) चाङ्गेरी (खट्टी चौपतिया), घी से चौगुना ही दही, इन
सब वस्तुओं को एक साथ मिलाकर पकाना चाहिये। इस
उत्तम 'चाङ्गेरी घृत' को मन्द-मन्द आँच से पकाना चाहिये।
यह घृत कफ तथा वायु विकारों, ग्रहणीरोग तथा बवासीर के
विकारों को नष्ट करता है और आनाह (आमाशय तथा अन्त्र
की गति का निरोध), गुदभ्रंश (काँच निकलना), मूत्रकृच्छ्र
तथा प्रवाहिका (पेचिस) को नष्ट करता है।
मसूर घृत
मसूराणां पलशतं नीरद्रोणे विपाचयेत् ।। 25 ।।
पादशेषं शृतं नीत्वा दत्त्वा बिल्वपलाष्टकम्।
घृतप्रस्थं पचेत् तेन सर्वार्तीसारनाशनम् ।। 26 ।।
ग्रहणीं भिन्नविट्कं च नाशयेच्च प्रवाहिकाम्।
मसूर सौ पल (5 सेर) को एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4
तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर क्वाथ को
लेकर, आठ पल (32 तोला) बेलगिरी का कल्क बनाकर
घी एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) लेकर सबको एक साथ
पकाना चाहिये (जब परिपाक हो जाये तो छानकर रख लें)।
यह घृत सभी प्रकार के अतिसार को नष्ट करता है और
ग्रहणीरोग तथा प्रवाहिका (पेचिस) को नष्ट करता है।
वक्तव्य-साबूत मसूर लेनी चाहिये, दाल नहीं। इसे
गलने तक पकाना चाहिये।
कामदेव घृत
अश्वगन्धा तुलैका स्यात्तदर्धं गोक्षुरं स्मृतम् ।। 27 ।।
बलाऽमृता शालिपर्णी विदारी च शतावरी।
पुनर्नवाश्वत्थशुण्ठीकाश्मर्यास्तु फलान्यपि ।। 28 ।।
पद्मबीजं माषबीजं दद्याद् दशपलं पृथक् ।
चतुर्द्रोणेऽम्भसां पक्त्वा पादशेषं शृतं नयेत् ।। 29 ।।
जीवनीयाणः कुष्ठं पद्मकं रक्तचन्दनम्।
पत्रकं पिप्पली द्राक्षा कपिकच्छुफलं तथा ।। 30 ।।
नीलोत्पलं नागपुष्पं सारिवे द्वे बले तथा।
पृथक्कष्समा भागाः शर्करायाः पलद्वयम् ।। 31 ।।
रसश्च पौण्ड्रकेक्षूणामाढकैकं समाहरेत्।
घृतस्य चाढकं दत्त्वा पाचयेन्मृदुनाग्निना ।। 32 ।।
घृतमेतन्निहन्त्याशु रक्तपित्तमुरःक्षतम्।
हलीमकं पाण्डुरोगं वर्णभेदं स्वरक्षयम् ।। 33 ।।
वातरक्तं मूत्रकृच्छ्रं पार्श्वशूलं च कामलाम्।
शुक्रक्षयमुरोदाहं कार्श्यमोजःक्षयं तथा ।। 34 ।।
स्त्रीणां चैवाप्रजातानां गर्भदं शुक्रदं नृणाम्।
कामदेवघृतं नाम हृद्यं बल्यं रसायनम् ।। 35 ।।
ओजस्तेजस्करं हृद्यमायुष्यं प्राणवर्धनम्।
संवर्धयति शुक्रं हि पुरुषं दुर्बलेन्द्रियम् ।। 36 ।।
सर्वरोगविनिर्मुक्तौ पयःसिक्तो यथा द्रुमः।
कामदेव इति ख्यातं सर्पिरुक्तं महागुणम् ।। 37 ।।
असगन्ध सौ पल (1 तुला या 5 सेर), गोखरू पचास
पल ($2\frac{1}{2}$ सेर), शतावर विदारीकन्द, शालपर्णी, बरियारा,
गिलोय, पीपल के शुङ्ग, पद्मबीज (कमलगट्टा), पुनर्नवा,
गम्भार के फल तथा उड़द प्रत्येक दस-दस पल (40-40
तोला) इन सबको चार द्रोण (51 सेर 16 तोला) जल में
पकाना चाहिये। जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला)
जल अवशिष्ट रह जाये तो छानकर क्वाथ ले लें और क्वाथ में
एक आढक (3 सेर 16 तोला) घी डालकर पकायें। मुनक्का,
पद्माकाठ, कूठमीठा, पीपल, लालचन्दन, तेजपत्ता, नागकेसर,
किवाँच के बीज, नीलकमल (नीलोफर), सारिवा कृष्णसारिवा
तथा जीवनीगण के द्रव्य (देखें-शा०सं०, म०खं०अ० 6)
प्रत्येक एक-एक कर्ष (1-1 तोला), शर्करा (चीनी या खाँड)
दो पल-इन सबका कल्क बनाकर घृत में डाल दें और
पौड्रक (पौंडा) नामक ईख का रस एक आढक (3 सेर 16
तोला) तथा घी से चौगुना दूध इन सबको एक साथ मिलाकर
यथाविधि पाक करें। यह घृत रक्तपित्त, उरःक्षत, पाण्डुरोग
वर्णभेद (शरीर के वर्ण में परिवर्तन), स्वरक्षय (आवाज का
बैठना), मूत्रकृच्छ्र, उरोदाह (छाती में जलन) तथा पार्श्वशूल
(पसली की पीड़ा) का शीघ्र ही नष्ट करता है। इस घृत का
उन लोगों को सेवन करना चाहिये, जिनको अधिक समय
तक अन्तःपुर में रहना होता है और उन स्त्रियों को जिनको
सन्तान नहीं होती तथा दुर्बल (कमजोर) व्यक्तियों को यह
कामदेव घृत उत्तम बल वृद्धिकारक, कान्तिवर्द्धक, हृदय को
शक्ति देने वाला, पुष्टिकारक तथा रसायन है। यह ओजस् को
बढ़ाने वाला, हृदय की गति को व्यवस्थित करने वाला, आयु
को बढ़ाने वाला तथा प्राण की गति को व्यवस्थित करने