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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 3, कुल 130 में से

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पृष्ठ 3

७ किस्सा गाइतीन यारका।
काहू सुख न लह्यौ ॥ १ ॥ भँवरन प्रीत करी जलसुत
संपुट मुखहि गह्यौ ॥ प्रीत कर काहू सुख न लह्यौ ॥ २ ॥
सारंग प्रीत करी जु नादसों निकटहि वाण सह्यौ ॥ प्रीत
कर काहू सुख न लह्यौ ॥ ३ ॥ हम हू प्रीति करी मोहनसों
चलत न कछू कह्यौ ॥ प्रीति कर काहू सुख न लह्यौ ॥४॥
सूरदास जा दिनते बिछुरे नयनन नीर बह्यौ ॥ प्रीत० ॥५॥
बस इस भजन को सुनतेही चारों तरफ से वाह वाह
होनेलगी जोगिनजी अपना सितार बंद कर जाने की तयारी
करने लगीं लोगोंने इनकी बड़ी बीनती की और कहा अब
आप कहां जातीहो यह जगह आपही की है सब तरह का
आराम है जहां जी चाहे जबतक खुशीसे रहो हम सब लोग
आपकी सेवा में हाज़िर हैं।
यह वचन रईसों का सुनकर जोगिनने वहांका रहना पसंद
किया और एक क्यारी में आमके सघन वृक्षों के नीचे अपना
आसन जमादिया जब इसको तीन चार दिन बीते कि वाद-
शाहके सामने यह जिकर पेश हुआ कि गरीबपरवर रतनबाग
में एक जोगन जिसकी उमर बीस वरस की होगी आनकर ठ-
हरी है गाने में लासानी है तमाम शहर में उसके गानेकी शो-
हरत होचुकी है सरकार भी अगर गाना सुनेंगे हैरत अंगेज होंगे
यह सुन बादशाह ने फरमाया कि अच्छा आज शाम कोशा-
ही बाग में महफिल बनकर तयारहो और मयकुल इजलास-
अह्ल कारान हाज़िर हों जोगन का गाना कराया जाये यह बा-
त बादशाह की सुनकर वज़ीरोंने वैसाही किया तमाम शहर में
ये बात जाहिर होगई कि आज शाहीबाग में जोगनका गाना है
खलकत पहलेसेही जमां होगई थी वादशाह सलामत भी आ