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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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२४४ किस्सा साढ़ेतीन यारका ।
नहीं हमें काम अब अपने और बेगानेसे ।
है जुदा ज़माना हम जुदे ज़माने से ॥
है तलाश उसकी जिसपर दिल मायल है ।
तडफै है मीन की तरह ये आशिक दिल है ॥
दोहा-सहरा से राजी रहें, वस्ती से घबड़ाय ।
मोहन प्यारे के बिना, हमें न कछू सुहाय ॥
यह बात जोगनजीकी सुनकर साहूकार लोग कहनेलगे वा
क्या बात है आपका कहना ठीक है इसमें फर्क नहीं मगर ह
लोगों पर तो अवश्य ही कृपा होनी चाहिये अव्वल तो हमार
ऐसी तकदीर नहींकि जो महात्माओंका दर्शन हो न मालुम
किस पुन्य प्रताप के उदय से तुमारा दर्शन हुआ ।
यह वचन सुन और उनको देखा कि इनको मेरा गानापसंद
है कहना मंजूर करना चाहिये जगह जगह गाना होनेमें शहर में
शोहरा होगाही और हौले २ किसी न किसी दिन बादशाह
सलामत के कान तक खबर पहुंचही जायगी यह विचारकरउन
लोगोंसे कहा अच्छा बाबाजैसा तुम कहतेहो वैसाही होगा यह
वचन सुन साहूकार लोग जोगनजीको प्रणाम कर अपनेअपने
मकानोंको आये और जब शाम का वक्त हुआतो सब साहूका
रतनबागमें जमा हुए इसके गानेकी धूम तमाम शहरमें छगई
थी और यह चरचा फैल गई थी कि शाही बागमें एक जोगनआई
है गाने बजाने में एकही है आज उसी जोगन का रतनबागमें
गाना है वश फिर क्या था एक घंटे के अंदर हज़ारों आदमी
बागमें जमा होगये कुल खलकत उमड पडी रईसों ने दो
चार आदमी और लियाकत दार अपने मुनीम मैनेजर वगैरह
और संवारी जोगिनजी के लिवाने को भेजे वह संवारी में