सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 410 of 415
Read in context२४
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८
अर्थ:—हे चन्द्रमुखि जननि ! न मुझे मोक्ष की इच्छा
है न संसारिक वैभव की इच्छा है, न विज्ञान की ही अपेक्षा
है और न सुख की इच्छा, इसलिये यह ही याचना करता हूं
कि मेरा जीवन 'मृडानी' रुद्राणी, शिव २ भवानी' इस प्रकार
जप करता हुआ बीते ।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिन्तनपरै र्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
अर्थ:— हे श्यामे ! अम्बे ! मेरेसे न तो विधिपूर्वक तेरी
विविध सामग्रियों से पूजा ही हुई है ! और मेरी रूखे चिन्तन
में लगी वाणी द्वारा क्या नहीं किया गया है ? तो भी यदि
तूही मुझ अनाथ पर जो कुछ कृपा रखती है, हे मां वह तेरे
लिये उचित है । (जो मुझ जैसे कुपात्र पर कृपा तो है ही )
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा :
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥