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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 409

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अर्थः — हे अपर्णे ! तुम्हारे मंत्र का एक वर्ण भी कान
में पड़जाने का जब यह फल है, कि बकवास करने वाला अबोध
भी मधुपाक जैसी मधुरवाणी का वक्ता हो जाता है और रंक
भी किरोडों सुवर्ण की मुद्राओं में दीर्घ काल तक निर्भय विहार
करता है । तो कौन मनुष्य जान सकता है कि हे जननि ,
जप की विधि के अनुसार जप करने का क्या फल होगा.
क्योंकि जप विधि को कौन जानता है ? अर्थात् कोई नहीं
जानता ।
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पट धरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥
अर्थः—हे भवानि ! चिता की भस्म कालेप करने वाला,
हलाहल खाने वाला, दिगम्बर जटाधारी, कंठ में सर्पों का हार
पहिनने वाला, पशुओं का पति, कपाली ( हाथ में भिक्षा के
लिये खप्पर लिये ) भूतेश ईश्वर जगत की एक मात्र ईशन (शासन)
करने की पदवी धारण करता है. इसका कारण तेरा पाणिग्रहण
करने की परिपाटी का ही फल है ।
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
नविज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।