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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 372 of 415

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Page 372

३२२ सौन्दर्य लहरी
एक ही निर्विशेष चिदात्मा ब्रह्म की सगुण निर्गुण भेद से
उपासना की जाती है। सगुण ब्रह्म के दो भेद हैं, एक जगत् का
नियन्ता और दूसरा जगदात्मक अर्थात् सबका अन्तरात्मा। ज्ञान
क्रिया, गुणादि की उपाधि भेद से जैसे एक ही ईश्वर का अनेक
रूपों से ध्यानार्चन किया जाता है, वैसे ही उसका स्मरण भी अनेक
नामों द्वारा किया जाता है। विष्णु सहस्रनाम, गोपाल सहस्रनाम,
शिवसहस्रनाम दुर्गासहस्रनाम, ललितासहस्रनाम, अनेक सहस्र-
नामावलियां प्रसिद्ध हैं, जिनमें पुलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग
पदों द्वारा ब्रह्मपद का गुणविशिष्ट निर्देश देखने में आता है,
वास्तव में ब्रह्म को किसी लिंग वाच्य नहीं कहा जा सकता।
भास्करराय अपनी ललितासहस्रनाम की व्याख्या में कहते हैं कि
‘पदानुसारीण्येव हि लिंगानि, नतुवास्तविकं ब्रह्मण्येकमपि लिंगम्।’
अर्थात् ये लिंग पदानुसारी मात्र हैं, वास्तविकता यह है कि ब्रह्म में
एक भी लिंग नहीं होता जैसा कि कहा है,
पुंरूपं वा स्मरेद्देवि स्त्रीरूपं वा चिन्तयेत् ।
अथवा निष्कलं ध्यायेत्सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥
अर्थ:—हे देवी, चाहे पुंरूप से उसका स्मरण करो, चाहे
स्त्रीरूप से चिन्तन करो, अथवा उस निष्कल ब्रह्म पद का ध्यान
सत्चित् आनन्द लक्षण युक्त करो।
बहिर्यागों में भक्त जिसका भगवान् अथवा भगवती पदों से
संबोधन करता है, उसी को अन्तर्याग वाला साधक प्रज्ञानात्मा,