सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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जैसे ईंधन में अग्नि। बाह्य यागों में जैसे मूर्ति अथवा यंत्रों में देव
का आवाहन प्राणप्रतिष्ठा और तदनन्तर पंचोपचार षोडशोपचार सहित
अर्चन पूजन एवं ध्यान किया जाता है, वैसेही अन्तर्याग में भी,
देहरूपी प्रतीक के अंग प्रत्यंगों में करन्यास अंगन्यासों द्वारा उसी
देव की प्रत्येक अंग संबंधीनी शक्तियों का आवाहन, हृदय में
प्राणप्रतिष्ठा और मानसिक पूजन ध्यानादि अनेक क्रियाओं का
विधान है, जिनका तात्पर्य अपने देह रूपी प्रतीक में उस सर्वान्तर्यामी
की जागृति करना है, जब उस देवात्मिका शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव
अपने अन्तर में होने लगता है, तब बाह्य प्रतीकों की अपेक्षा नहीं
रहती, तो भी वे मूर्तियां और यंत्रादि विशेष आदर्णीय बने ही
रहते हैं।
इसके पश्चात् उस मनुष्य की उपासना का स्तर सूक्ष्म हो जाता है
और उपासना के पीठ स्थान स्थूल देहको छोडकर सूक्ष्म देह के स्तरों
पर उठने लगते हैं। पंचतन्मात्राओं पंचप्राणों और पंच कर्मेंद्रियों का
देहसे सुषुम्नागत मूलाधारादि चक्रोंद्वारा संबंध है और पंचज्ञानेद्रियों का
आज्ञाचक्र द्वारा। साधक इस स्तरपर अपना भावनायुक्त ध्यान क्रमशः
भिन्न-भिन्न चक्रों पर करता हुआ सहस्रार तक ऊपर उठाता है।
प्रत्येक चक्र पर प्रत्यक्ष होने वाले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव
प्रभृति सब शिव शक्ति भेद से एक ही परम चेतनतत्व के उस उस
चक्र से संबंधित रूप हैं। इनसे ऊपर नाद, कला, ज्योति, शांति
आदि भी उस ही परम चिति शक्ति की अभिव्यक्तियां प्रत्यक्ष रूप से
अनुभव में आती हैं।