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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 368 of 415

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Page 368

३१८ सौन्दर्य लहरी
समर्पण
[१०२]
निधेनित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघाटज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्यानिर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतपदे
निरातंके नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥
अर्थ:—हे सदा हंसमुखि असीमगुणनिधे, नीतिनिपुणे,
निरतिशयज्ञानवति, नियम परायण भक्तों के चित्त में घर करने
वाली, नियति से निर्मुक्त अर्थात् नियति से अतीते, सब शास्त्र
उपनिषद् जिसके पदकी स्तुति करते हैं ऐसी अभये, सनातनी
नित्ये ! मेरी भी इस स्तुति को स्वीकार करके अपने निगमों में
स्थान दो ।
[१०३]
प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैर्घ्य रचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधि सौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥
अर्थ:—हे जननि ! तेरी प्रदान की हुई वाक्शक्ति से
की गई इस स्तुति के शब्द इस प्रकार हैं जैसे दीपक की
ज्वालाओं से सूर्य की आरती उतारना, अथवा चन्द्रकान्त मणि
से टपकते हुए जलकणों से चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करना,
अथवा समुद्र का सत्कार उस ही के जल से करना ।