सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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का भी जिक्र आता है वे ये हैं, घृणा, लज्जा, भय, निन्दा, शोक,
जाति, कुल और शील । परन्तु भावनोपनिषद् में मोह अथवा राग
को ही पाश कहा है। श्वेताश्वतरोपनिषद् के (१,४) में भी एक ही
पाश बताया गया है, जैसे 'अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं' इत्यादि ।
अगला १०२ वां श्लोक भी क्षेपक समझा जाता है। हम
कह आये हैं कि लक्ष्मीधर के मत के अनुसार ९४, ९९ और १०२
श्लोक क्षेपक हैं और कैवल्य शर्मा ८८ वें श्लोक को ही क्षेपक
मानते हैं। अनुमान से भगवत्पाद ने पूरे १०० श्लोक का ही
यह स्तोत्र लिखा होगा। हमारी समझ में ९४ वां श्लोक क्षेपक
नहीं होना चाहिये । इसलिये ८८, ९९ और १०२ ये तीन
श्लोक क्षेपक कहे जा सकते हैं। ९९ श्लोक का क्षेपक होना तो
स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि अन्तिम दो श्लोकों को ग्रंथ का अंग
न माना जाय, क्योंकि उनमें ग्रंथ की स्वीकृति के लिये भगवती से
पृथक प्रार्थना की गई है अर्थात् ग्रंथ जिसके लिये प्रार्थना की गई
है वह पूरे १०० वें श्लोक पर समाप्त होता है, तो प्रार्थना के इस
१०२ श्लोक को भी क्षेपक कहना उचित नहीं। इस दृष्टि से एक
श्लोक ही क्षेपक कहा जा सकता है और वह ९९ वां श्लोक हो
सकता है अथवा ८८ वां। ८ और ९ के अंक के पढने में
भ्रांति होने के कारण किसी ने ८८ को किसी ने ९९ को क्षेपक
समझ लिया है और संभव है ९९ के स्थान पर ८८ को गलती से
क्षेपक कह दिया गया हो।