सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 343 of 415
Read in contextसौंदर्य लहरी २९३
इसलिये बद्धजीव का अन्तरात्मा रूपी शिव सदा अलग होने पर
भी भगवती के पद प्रहार से अपने को शोक रहित अनुभव करने की
सदा स्पृहा किया करता है।
(८६)
मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥
कठिन शब्द— मृषाकृत्वा=झूटा करके, गोत्र=वंश, पहाड,
नाम, अथवा गां इन्द्रियं त्रायते इति गोत्र। स्खलन=गिरावट,
फिसलना। वैलक्ष्य=लज्जा, स्वभाव का परिवर्तन, लक्ष्य से हटना।
शल्यं=बाण, अन्तर्दाह। उन्मूलितवता=जड से उखाडता हुआ, सर्वथा
नष्ट करता हुआ। तुलाकोटि=मंजीरा, नूपुर, तराजू के पलडों की
आकृति वाला। क्वाणैःकिलिरतं=घंटियां, मंजीरों, अथवा नूपुरों के
बजने का शब्द। ईशानरिपु=शिव का शत्रु, काम। भर्त्ता=पालने
वाला, पति।
सामान्य अर्थ—तेरे गोत्र का अपमान करने से लज्जित
नीचे नेत्र किये हुए भर्तार के ललाट पर तेरे चरण कमलों का
ताडन होने पर इशानरिपु ( कामदेव ) ने जिसको चिरकाल से
जलाया जाने के कारण अन्तर्दाह था उसे निकालते हुए अपना
बदला देखकर, तेरे नूपुरों के बजने के कणत्कार की किल-
किलाहट रूपी हर्ष ध्वनि की।