सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextअर्थ—हम तेरे इन दोनों चरणों को प्रणाम कहते हैं,
जो नयनों को रमणीय हैं, और जिन पर लाक्षा की तीव्र कान्ति
चमक रही है। जिनके अभिहनन की स्पृहा से पशुपति तेरे
प्रमदावन के अशोक वृक्ष से अनन्य असूया रखते हैं।
ऐसा कहते हैं कि पद्मिनी स्त्री के पद प्रहार से अशोक वृक्ष
प्रसन्न होता है। इस श्लोक में यह भाव है कि भगवती की
वाटिका के अशोक वृक्ष को भगवती के पद प्रहार का सौभाग्य सदा
प्राप्त है, इसलिये पशुपति उससे ईर्ष्या रखते हैं, क्योंकि उनको भी
भगवती के चरण प्रहार की स्पृहा है। अशोक का अर्थ वीत शोक
अथवा शोक रहित है। और पशुपति भी वीतशोक होने के कारण
अशोक है। जीवों को पशु कहते हैं, क्योंकि वे संसार की आसक्ति
स्वरूप राग पाश में बंधे हैं। शिव को इसी अभिप्राय से पशुपति
कहा जाता है।
पाशबद्धस्तथा जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः ।
पाशबद्धः पशुप्रोक्तः पाशमुक्तः पशुपतिः ॥
प्रत्येक मनुष्य में जीव भाव और शिव भाव साथ २ रहते हैं।
जैसा कि भगवान गीता में कहते हैं—
उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेतिचाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥
वेदानुवचन भी हैं 'द्वासुपर्णा सयुजा सखाया' 'असंगोयमात्मा'
इत्यादि।