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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 271

सौन्दर्य लहरी २२१
का चन्द्रमा से भी संबंध है। अब आध्यात्म रूप समझाते हैं। जैसे
पृथिवी के गर्भ में सात पाताल माने जाते हैं, वैसे ही देह के अधो-
भाग में चरणों का तलभाग, ऊपर का भाग, गुल्फ, जंघा, जानु, ऊरु
और नितंब सात पाताल समझे जाते हैं इनमें फैली हुई नाडियां
मणिपूर चक्र से निकलती हैं, इनके द्वारा जो अग्नि इन अंगों को
तप्त रखता है वह पातालाग्नि है। उसका स्थान मूलाधार तक है।
वह ही अग्नि ऊपर के भाग में हड्डियों में व्याप्त है उसे पार्थिव अग्नि
कहा गया है। आस्थि, मज्जा और शुक्र में भी यह ही पार्थिव अग्नि
कार्य करता है। शुक्र में भी दो शक्तियां कार्य करती हैं, मज्जा से
बनने के कारण उसमें एक प्रजनन शक्ति वाला भाग है, दूसरा
प्राण शक्ति वाला भाग । प्रजनन के लिये प्राण शक्ति आवश्यक
नहीं होती, इसलिये प्रश्नो पनिषद् में कहा है कि रात्रि में
रतिक्रिया के रमण करने वालों की प्राण शकि का ह्रास नहीं होता,
और वह ब्रह्मचारी के ही तुल्य हैं, परन्तु दिन में रमण करने वालों
के प्राण भी नष्ट होते हैं, इसलिये दिन को रतिक्रिया का निषेध है।
प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्यासंयुज्यन्ते,
ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्यासंयुज्यन्ते ।
(प्र० १, १३)
प्रजनन द्रव्य में सातों धातुओं का बीज है, वह भाग ऊर्ध्व
होकर अन्नमय कोष को पुष्ट करेगा, और दूसरा प्राण वाला भाग
प्राणमय को पुष्ट करेगा । और इस स्तर पर दोनों का
पृथकरण होने से अन्नमय कोष से प्राणमय कोष का पृथक्करण