सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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अर्थः-उसने प्राण की सृष्टि की, प्राण से श्रद्धा, आकाश,
वायु, तेज, जल, पृथिवी इत्यादि। उक्त प्रतिप्रसव क्रम षड्चक्र वेध
का विषय है।
इस संबंध में यह बात भी जानने योग्य है कि विशुद्धचक्र की
डाकिनी शक्ति का संबंध त्वचा से, अनाहत् की राकिनी शक्ति का
रुधिर से, मणिपूर की लाकिनी शक्ति का मांस से, स्वाधिष्ठान की
काकिनी शक्ति का मेदा से, मूलाधार की साकिनी शक्ति का
अस्थि से, आज्ञा की हाकिनी शक्ति का मज्जा से और सहस्रार की
याकिनी शक्ति का संबंध शुक्र से है। देखें ललिता सहस्रनाम
श्लोक (१४९-१६१)
पृथिवी के गर्भ रूपी पातालों में जो अग्नि है, वह अग्नि का
एक रूप है, दूसरा रूप भूतल पर काष्ठपाषाणादि में है, जल में रहने
वाला तीसरा रूप है, विद्युत् अग्नि का चौथा रूप है और सूर्य में
अग्नि का पांचवा रूप है। उष्णता, प्रकाश और प्राणशक्ति तीनों
का सूर्य के ताप में युगपद् समावेश रहता है। चन्द्रमा सूर्य के ताप को
स्वयं पी लेता है और शीतल प्रकाश एवं सोम के रूप में प्राणशक्ति को
अपनी चंद्रिका के साथ पृथिवी पर भेजा करता है। प्राण ही जीवन
शक्ति है, जिसको चेतन शक्ति भी कहते हैं। प्राणमय कोष की प्राण
अपानादि ५ वृत्तियां चेतन शक्ति की स्थूल क्रियायें हैं। चिति स्वरूप
प्राण ही उपरोक्त श्रुति में ब्रह्म से उत्पन्न होने वाला सोम कहा गया
है अग्नि के उपरोक्त पांचों रूप अधिभौतिक स्तर पर बताये गये हैं,
वे परस्पर में संबंधित हैं और एक अग्नि के ही रूपान्तर हैं और उन