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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 268 of 415

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Page 268

२१८ सौंदर्य लहरी
पास गया और उससे उन प्रश्नों का उत्तर जानने की जिज्ञासा की ।
राजा ने कहा यह पंचाग्नि विद्या कहलाती है । वे प्रश्न इस
प्रकार हैं:-क्या तुम जानते हो कि सब जीव मरकर यहां से जाते हैं,
क्या तुम जानते हो कि फिर यहां लौटकर आते हैं, क्या पितृयान
और देवयान दोनों मार्गों को जानते हो, क्या जानते हो कि क्यों
यह लोक कभी नहीं भरता, अर्थात् इस अवागमन का चक्र कभी
बन्द क्यों नहीं होता, और क्या यह भी जानते हो कि पांचवीं
आहुति में जल से यह देह कैसे बनता है ? इन प्रश्नों को पूछने का
राजा का अभिप्राय स्पष्ट है कि जो मनुष्य प्रभव क्रम को जानता है,
वह ही आवागमन से छूटने के लिये देवयान मार्ग का द्वार खोलते
समय, इसका प्रतिकार स्वरूप प्रति प्रसव क्रम भी जानने का यत्न
करेगा, नहीं तो आवागमन का चक्र कभी बन्द नहीं होता ।
राजा न जो प्रभव क्रम बताया वह इस प्रकार है:—
(१) द्युलोक प्रथम अग्नि है, जिसमें सूर्य रूपी ईंधन जल रहा
है, उसमें देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, और उससे
सोम उत्पन्न होता है ।
(२) पर्जन्य दूसरी अग्नि है, उसमें सोम की आहुति दी जाती
है और वर्षा उत्पन्न होती है ।
(३) पृथिवी तीसरी अग्नि है, उसमें वर्षा की आहुति दी
जाती है और अन्न उत्पन्न होता है ।
(४) मनुष्य का देह चौथी अग्नि है, उसमें अन्न की आहुति
दी जाती है और शुक्र उत्पन्न होता है ।