सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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भ्रूमध्य निलयो बिन्दुः शुद्ध स्फटिक संनिभः ।
महा विष्णोश्च देवस्य तत्सूक्ष्मं रूपमुच्यते ॥ (५. ३४)
एतत्पंचाग्निरूपं यो भावयेद्बुद्धिमान् धियः ।
तेन भुक्तंच पीतंच हुतमेव न संशयः ॥ (५. ३५)
अर्थः— पातालों के अधोभाग में जो कालाग्नि रहता है,
वह शरीर में मूलाधार का अग्नि है, जिससे नाद उत्पन्न होता है ।
स्वाधिष्ठान में वडवाग्नि रहता है । काष्ठ पाषाण का जो अग्नि है वह
अस्थियों में रहता है, उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं । अन्तरिक्ष में जाकर
अर्थात् मणिपूर में वह ही स्वान्तरात्मा स्वरूप विद्युत् अग्नि है ।
आकाशस्थ अग्नि सूर्य है वह नाभि (सूर्य) मण्डल में आश्रित है ।
यह सूर्य विष की वर्षा करता रहता है परन्तु उन्मुख होकर अमृत
का स्राव करता है । विन्दु भ्रूमध्य में लीन होकर शुद्ध स्फटिक
सदृश हो जाता है, जो महा विष्णु देव का सूक्ष्म रूप कहलाता है ।
इस प्रकार पंचाग्नि का जो बुद्धिमान ध्यान करता है, उसका खाया-
पीया हुआ आहुति के तुल्य है, इसमें सन्देह नहीं ।
छान्दोग्य उपनिषद् के पांचवे अध्याय के खण्ड ३ से नवम
खण्ड तक जिस पंचाग्नि विद्या का वर्णन मिलता है, उसीका
यहां लय क्रम बताया गया है । छान्दोग्य कथित पंचाग्नि विद्या की
गाथा इस प्रकार है । अरुणि के पुत्र श्वेतकेतु से पांचाल देश के
राजा प्रवाहण जैबलि ने ५ प्रश्न किये, परन्तु वह एक का भी उत्तर
न दे सका, तब उसने अपने पिता से पूछा, परन्तु वह भी नहीं
जानता था । इसलिये अरुणि अपने पुत्र को साथ लेकर राजा के