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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 248 of 415

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Page 248

१९८ सौन्दर्य लहरी
अथवा चित्र की प्रतिमा में चक्रों की कल्पना करना आकाश में ही
कल्पना करने के सदृश है। हां ! श्री चक्र पर अर्चन तो किया जा
सकता है, परन्तु ध्यान तो अपने अन्दर ही करना पड़ेगा। इसलिये
इस श्लोक और आगे आने वाले श्लोकों में बताए गये ध्यान अपने
ही शरीरस्थ चक्रों में किये जाने चाहियें। 'तव' अर्थात् 'तेरे' पद् का
प्रयोग किये जाने का एक अभिप्राय यह भी हो सकता है कि
साधक को अपना देहाभिमान त्याग कर अपना स्थूल सूक्ष्म
देह सब भगवती का ही रूप समझना चाहिये। जैसा कि गत श्लोक
में कहा जा चुका है कि मन, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी
सब भगवती की परिणति के कार्य हैं। जब सारा प्रपंच भगवती की
परिणति के अन्तर्गत है तो 'मेरा' कहने के लिये स्थान नहीं रहता।
२२ वें श्लोकोक्त 'भवानित्वं' अथवा २० वें श्लोकोक्त 'त्वामहमिति'
की भावना करने वाले साधक के मुख से ' तवाज्ञा चक्र' इत्यादि
शब्दों का उद्गार अनन्यता का सूचक है। और सुषुम्ना को भी
जिसमें सब चक्रों की स्थिति है चिदात्मिका महा शक्ति का ही एक
रूप समझा जाता है। जैसे नीचे दी हुई श्रुति से प्रकट है।
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्र मण्डलात् ।
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ यो. शि. (६, ३)
इसलिये सुषुम्ना में स्थित सब चक्र चिति शक्ति के विभिन्न
केन्द्र होने के कारण भगवती के ही चक्र हैं। आज्ञा चक्र से सहस्रार
में उठने वाली दोनों ओर की नाडियों का नाम वरणा और असी
है, इस स्थान को वाराणसी कहते हैं। यह ही स्थान काशी है