सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १९७
कठिन शब्दः—निरालोके लोके=जिस लोक मे सूर्य चन्द्र और
अग्नि का प्रकाश नहीं है । लोकः=मनुष्य ।
अर्थः—तेरे आज्ञा चक्र में स्थित किरोडों सूर्य और चन्द्र
के तेज से युक्त पर शिव को वन्दना करता हूं, जिसका वाम
पार्श्व् पराचिति से एकीभूत हैं । उसका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक
आराधन करते हैं, वे उस प्रकाशमान लोक में निवास करते हैं
जो सूर्य चन्द्र और अग्नि का विषय नहीं है अथवा सब आतङ्को
से मुक्त हैं । अथवा सूर्य्यचन्द्र और अग्नि का विषय न होने के
कारण उन के प्रकाश से प्रकाशित नहीं हैं ।
तब आज्ञा चक्र कहने का क्या अभिप्राय है ? भगवती की
काल्पनिक मूर्ति को ध्यान में लाकर उसके भ्रूमध्यस्थ स्थान में
पराचिति को वामांक में लिये हुए पर शिव की आराधना करने का
यहां विधान किया गया है, अथवा साधकों को अपने ही आज्ञा चक्र
में इस प्रकार ध्यान करने की ओर संकेत है, यह बात विचारणीय है ।
भगवती के देह के अन्तर्गत सारा ब्रह्माण्ड और पिंड दोनों हैं । अथवा
श्री चक्र जो भगवती के देह का प्रतीक है, उसके षोडश और अष्ट
दलों में आज्ञा चक्र की भावना पूर्वक अर्चन करने से श्लोकोक्त
भालोक भवन की प्राप्ति कही गई है । ब्रह्माण्ड रूपी विराट देह में
आज्ञा अथवा अन्य चक्रों का स्थिर करना असंभव है । और
काल्पनिक मूर्ति के ध्यान में भी चक्रों की कल्पना करने पर साधक
को अपने भीतर ही ध्यान करना पडेगा, अन्यथा ध्यान नहीं हो
सकता । आकाश में तो चक्रों की कल्पना करना वृथा है । पार्थिव