सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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से चन्द्रकला नित्य पूर्ण रहती है, इसलिये वह ही वास्तविक नित्या
है। श्री चक्र का तीनों मण्डलों और चक्रों से संबंध पहिले बताया
जा चुका है। यदि श्री चक्र के त्रिकोण को मूलाधार, अष्टार चक्र
को स्वाधिष्ठान, अन्तर्दशार को मणिपूर, बहिर्दशार को अनाहत,
चतुर्दशार को विशुद्ध, ४ श्री कंठों को आज्ञा चक्र समझा जाय और
विन्दु को सहस्रार, चतुष्कोण भूगृह को ब्रह्माण्ड, तो विन्दु स्थान में
स्थित चिति रूपा चन्द्रकला की चन्द्रिका का प्रकाश सब पर प्रतिबिंबित
होता समझना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि मनरूपी
चन्द्रमा में चेतना देने वाला चेतन प्रकाश (Consciousness)
सहस्रार में स्थित चिन्मात्र सत्ता का प्रतिबिंब है। जो अनाहत् चक्र
में स्थित प्राणरूपी सूर्य के उर्ध्वगामी होने पर अपने विशुद्ध स्वरूप
में अनुभवगम्य होता है जो प्राणरूपी सूर्य और मनरूपी चन्द्र
दोनों की क्रियाओं का निःस्पन्द स्वरूप योग (neutralization)
होने पर अनुभव में आता है। प्राण और मन दोनों को चिति शक्ति
से उद्भूत क्रमशः सत्तात्मिका और चिदात्मिका शक्तियों के दो स्रोत
(currents) समझना चाहिये। जैसे विद्युत् शक्ति की धनात्म
(positive) और ऋणात्म (negative) स्रोत हुआ करते
हैं। जहां दोनों का उदय और अस्त होता है वह परम कला है।
पंचदशी के अक्षरों की सुषुम्नापथ पर सहस्रार में चढते समय
इस प्रकार भावना की जाती है। प्रथम अक्षर को अधःसहस्रार से
उठाकर उसका विषुस्थान पर लय किया जाता है, दूसरे अक्षर को
विषुस्थान से उठाकर उसका मूलाधार में लय किया जाता, तीसरे
को मूलाधार से उठाकर स्वाधिष्ठान में, चौथे को स्वाधिष्ठान से