सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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करता है। शुद्ध चिति शक्ति की १५ कलाएं पंचदशी के १५
अक्षरों से क्रमशः संबद्ध हैं और १६ वीं कला शुद्ध चिति शक्ति
चिन्मात्र निर्विकल्प समाधि में विराजने वाली स्वयं महात्रिपुर-
सुन्दरी है क्योंकि अन्य सब कलाएं घटती बढती हैं, चन्द्र का बिंब
सदा एक समान रहता है। इसलिये प्रत्येक कला को १६ वीं
कला का अंग समझना चाहिये और प्रत्येक कला का पूजन और
ध्यान तदनुसार उस कला की संबंधित तिथि में १६ वीं कला
सहित किया जाता है। कुण्डलिनी के सहस्रार में चढते समय वह
मानस चक्रस्थ चन्द्र मंडल में छिद्र कर देती है, उससे अमृत टपक
कर आज्ञा चक्र को अमृत मय कर देता है, जिससे वहां पर चन्द्रमा
की सब कलाएं नित्य चमकने लगती हैं, और उनका नाम नित्या
कहलाने लगता है। ये कलायें फिर विशुद्ध चक्र पर उतर कर
उसकी १६ पंखडियों पर प्रकाशमान हो जाती हैं। सहस्रार के
मध्यस्थ चन्द्र मण्डल को वैन्दव स्थान कहते हैं यह शुद्ध चिति
शक्ति की आनन्दमयी कला का स्थान है, जिसको श्री अथवा
महा त्रिपुर सुन्दरी कहते हैं।
आधार चक्र अन्धकारमय चक्र है, स्वाधिष्ठान जल का स्थान
है, इसलिये वह भी कुछ थोडा प्रकाशयुक्त अन्धकारमय चक्र है,
मणिपुर में अग्नि का प्रकाश भी उज्वल न होने से उसका स्थान भी
अन्धकार युक्त ही है। इसलिये नीचे का अग्नि मंडल अन्धकार
मिश्रित प्रकाश युक्त मण्डल है। अनाहत् में सूर्य का प्रकाश रहता
है और विशुद्ध में चन्द्र का। आज्ञा चक्र अमृत का स्थान है।
इसलिये विशुद्ध और आज्ञा स्वयं प्रकाशमान नहीं हैं, वे सहस्रार
में स्थित चन्द्रकला से प्रकाशित होते हैं। सहस्रार में स्वतंत्र रूप