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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 222 of 415

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Page 222

१७२ सौंदर्य लहरी
अनियंत्रित कामाचार, असंयत सामाजिक व्यभिचार दुराचार का
मानो एक पंथ ही बन गया--तथापि मूलतः तंत्र एक बडी चीज थी,
बडी बलवती योग पद्धति थी ।........इसके दक्षिण और वाम
दोनों ही मार्ग एक बडी गंभीर अनुभूति के फल थे......एक है
ज्ञान का मार्ग और दूसरा आनन्द का मार्ग ।"
एक मत यह भी है कि कौलाचार अथवा वाम मार्ग बहिर्पूजा
का साधन है और समयाचार अथवा दक्षिण मार्ग भावना प्रधान
धारणा ध्यान समाधि युक्त अन्तर्याग रूपी योग साधन और मनन
निदिध्यासन पूर्वक ब्रह्म भावना का साधन है । बहिर्पूजा कर्म प्रधान
होती है, और अन्तर्पूजा भावना प्रधान । इसलिये निकृष्ट श्रेणि के
अधिकारियों को बहिर्पूजा में दीक्षित किया जाता है और उत्तम
अधिकारियों को अन्तर्पूजा में । परन्तु मध्यम श्रेणि के साधकों को
दोनों का आश्रय लेना पडता है, वे क्रमशः जैसे २ उनकी अन्तर्गति
दृढ होती जाती है शनैः २ कर्म काण्ड से हटते जाते हैं ।
इस श्लोक में ६४ तंत्रों का उल्लेख है, परन्तु भगवती ने देखा
कि उनसे श्रेय की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये उन्होंने शंकर से
श्रेय की प्राप्ति का साधन बताने का अनुरोध किया, तब शंकर ने
समयाचार का साधन कहा, जो पूर्वोक्त ६४ तंत्रों से पृथक है ।
वह भगवती के आग्रह पर श्रेय की जिज्ञासा रखने वालों के
कल्याणार्थ कहे जाने के कारण, शंकराचार्य भगवत्पाद ने उसको
भगवती का अपना स्वतंत्र तंत्र कहकर संकेत किया है, अर्थात्
'तेरा तंत्र' कहा है । शंकर भगवत्पाद उसे लोक हितार्थ सौन्दर्य
लहरी में प्रकाशित करते हैं । यह तंत्र सब तंत्रों से स्वतंत्र है ।