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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 221 of 415

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Page 221

सौंदर्य लहरी १७१
सनातन धर्म में उपासना की पद्धति वैदिक, तांत्रिक और
तंत्र पौराणिक तीन प्रकार की है। तथापि द्विजों के
लिये मिश्रित पद्धति काम में लाई जाती है,
जो द्विज नहीं हैं उनको वेदों का अधिकार नहीं दिया गया है,
वे तांत्रिक और पौराणिक उपासनाओं में ही दीक्षित किये जाते हैं।
तांत्रिक उपासना के दो भेद हो गए हैं-- समयाचार और कौला-
चार, जिनको दक्षिण और वाम मार्ग भी कहते हैं। ब्राह्मणों के
लिये कौलाचार निषिद्ध है, क्योंकि उसमें पंचमकार अर्थात् मांस,
मदिरा, मत्स्य, मैथुन और मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। वामा-
चार के कारण ही साधारण जनता की दृष्टि में सारी तांत्रिक
उपासना बदनाम हो रही है। यद्यपि पंचमकारों का आध्यात्मिक अर्थ
भी किया जाता है, जैसे मदिरा से सोमपान, मैथुन से शिवशक्ति
का सहस्रार में योग, इत्यादि; और कुलार्णव तंत्र में स्पष्टतया उनका
निषेध कराने के लिये साधकों को चेतावनी दी गयी है कि इनका
प्रयोग करने वाला मनुष्य नर्कगामी होता है। परन्तु तो भी
यह निर्विवाद मानना पडता है कि सब साधक आध्यात्मिक दृष्टि
वाले नहीं होते। प्रायः अधिक मनुष्यों का लक्ष्य सांसारिक भोगों
की उपलब्धि तक ही सीमित रहता है। उक्त ६४ तंत्रों में ऐसी
ही सिद्धियां प्राप्त करने के साधन हैं, जो सच्चे जिज्ञासु को पथभ्रष्ट
कर सकते हैं। श्री अरविन्दुजी इस विषय पर कल्याण के 'शक्ति
अंक' में पृष्ठ ३२ पर प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं कि “विशेष-
कर तंत्र के वाम मार्ग में ऐसी २ बातें आ गई हैं, जिनसे न केवल
अच्छे बुरे का, पापपुण्य का कोई विचार न रहा प्रत्युत पाप पुण्यादि
द्वंद्वों के स्थान में स्वभाव नियत सद्धर्म की स्थापना होने के बजाय