सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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दृष्टिकोण को लेकर मंत्रोंका महत्व समझाया है । प्रत्येक श्लोक विशेष
महत्व रखता है जिसमें स्वामीजी के अध्ययन की झलक स्पष्ट
दिखाई देती है ।
मंत्रों के विषय में स्वामीजी ने जो व्याख्या सहित अपने विचार
लिखे हैं वह मंत्रशास्त्र के साधकों के लिये गूढतत्व, एवं अतीव
उपयोगी है । शिवजी के तांडव नृत्य के सम्बन्ध में जो भाव प्रकट
किये हैं उसमें स्वामीजी की मौलिकता स्पष्ट हो रही है । आनन्द-
लहरी को पढते पढते पाठक स्वयं आनन्द विभोर हो जाता है ।
सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभाजित किया गया है । प्रथम भाग
में ४१ श्लोक आनन्द लहरी के नाम से प्रसिद्ध हैं, और उत्तरार्द्ध-
खंड सौन्दर्य लहरी है । दूसरे खंड को पढ कर अनात्मवादी भी
आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार कर लेगा । चितिशक्ति का वर्णन
और अपरोक्षानुभूति के विषय को इतना स्पष्ट किया है कि पाठक
के चेतना स्तर को हिला देता है ।
चक्रों और कुण्डलिनी का विषय बहुत सुन्दर ढंग से स्पष्ट किया
गया है । उसका रहस्योद्घाटन बडे सरल शब्दों में किया गया है ।
प्रस्तुत ग्रंथ को साधनायुक्त बनाने में स्वामीजी ने स्तुत्य प्रयत्न
किया है और इसका समीकरण भी बहुत स्पष्ट हुआ है ।
विचारी, विवेकी, और ज्ञानी इस ग्रंथका समुचित आदर करेंगे
और इस ग्रंथ से लाभ उठावेंगे । आध्यात्मिक जिज्ञासु स्वामीजी के
इस महान कार्य के लिये आभारी हैं ।
इस ग्रंथका अधिक से अधिक प्रचार हो यही मंगल कामना है ।
कल्पवृक्ष कार्यालय उज्जैन । }
दिनांक ३ मार्च सन १९४९ } (डॉक्टर) दुर्गाशंकर नागर,