Skip to content
SarvaKosh
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 158 of 415

Read in context
Page 158

११२ सौंदर्य लहरी
हिमाचल की कन्या का वर्ण भी हिमवत् स्वच्छ होना चाहिये ।
हिम में शीतलता रहती है और प्रकाश भी । चन्द्रमा में भी शीतल
प्रकाश होने के कारण उसे अमृत बरसाने वाला कहा जाता है ।
इसी प्रकार भगवती का स्वरूप सुधामयी ज्योति के सदृश है । अमृत
को प्रकाशमान् समझना चाहिये ।
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधातं ।
तद्वात्मतत्वं प्रसमीक्ष्यदेही एकः कृतार्थो भवते वीत शोकः ॥
(श्वे. २, १४)
अर्थः— मिट्टी से लिपे हुए, तेजोमय अमृत सदृश चमकते
हुए शीतल बिंबवत् आत्म तत्व को देखकर देहाभिमानी जीव ब्रह्म
से एकता प्राप्त करके कृतार्थ और वीत शोक हो जाता है ।
ब्रह्मा सृष्टि के कर्ता हैं, इसलिये सर्व प्रथम कवि हैं, चारों
मुखों से वेदों का गान करते हैं, इसलिये सब कवियों में श्रेष्ठ हैं ।
वे भी भगवती के सौन्दर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके, अन्य कवि
इसलिये कुछ-२ कल्पना किया करते हैं । यदि अप्सराओं की उपमा
दी जाय तो वे भी तो भगवती के रूप को उत्सुकता से देखकर
ध्यान मग्न होकर समाधिस्थ हो जाती हैं। भाव यह भी है कि भगवती
के सौन्दर्य की कल्पना करने से समाधि लग सकती है ।