सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १११
कवियों की कल्पना के बाहर का विषय है; इस भाव को प्रकट
करने के लिये भगवत्पाद कहते हैं किः—
[ १२ ]
त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चि प्रभृतयः ।
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥
अर्थः— हे हिमगिरि सुते ! तेरे सौन्दर्य की तुलना
करने को ब्रह्मा प्रभृति कवीन्द्र भी कुछ कुछ कल्पना किया
करते हैं । तेरे सौन्दर्य को देखकर स्वर्ग की अप्सराएं ध्यानस्थ
हो जाती हैं और अनेक तपश्चर्या से भी कठिनता से प्राप्त होने
वाली शिवसायुज्य पदवी को सहज प्राप्त कर लेती हैं ।
सं० टि०:— यहां आनन्द लहरी के सौन्दर्य के चिन्तन से शिव-
सायुज्य पदवी की प्राप्ति कही गई है ! साधक को अपने अधिकारा-
नुसार बहिर्याग और अन्तर्याग द्वारा भगवती को प्रसन्न करना
चाहिये । बहिर्याग का फल अन्तर्याग है और अन्तर्याग द्वारा शिव-
सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति होती है । क्योंकि सहस्रार में शिव शक्ति का
ऐक्य होने पर परंपद की उपलब्धि कही गई है ।