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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 130 of 415

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Page 130

२० सौन्दर्य लहरी
आत्मा भी प्रकृति के संसर्ग से संसारी पुरुष दिखने लगता है।
पुरुषिका पद में यह ही भाव निहित है। माया कला के स्तर पर
काल, कला, नियति, विद्या और राग इन पांच कंचुकों के आवरणों
से स्फटिक सदृश आत्मतत्व सोपाधिक होने पर प्रकृति के रंग में
रंगा हुआ दिखने लगता है, और भगवती महामाया मनरूपी इक्षु
धनुष पर, जिस पर संकल्प रूपी भौंरों की प्रत्यंचा चढ़ी है, शब्द-
स्पर्श रूपरस गन्धात्मक पांच विषय रूपी बाणों को चढ़ाकर पुरुष का
आखेट करती है, राग रूपी पाश से बांधती है और क्रोध रूपी
अंकुश से ताडन करती है। परन्तु उसका अंकुश भी मां का क्रोध
होने के कारण खांड का बना हुआ है। इस प्रकार वह पुरुष को
अपरा प्रकृति के स्तर पर बांध देती है। इक्षु मधुर रस से भरा
रहता है, इसलिये आनन्द रस के भोगी मन को इक्षु धनुष से
उपमित किया गया है, मन में सदा संकल्प विकल्प रूपी भौंरे
उडते रहते हैं, उनको धनुष की प्रत्यंचा से उपमा दी गई है।
जैसे वे पुष्पों के मकरन्द की कामना से आकाश में गुंजारते रहते हैं,
वैसे ही मन की संकल्पात्मिका वृत्तियां विषयों की वासना से
चित्ताकाश को प्रतिध्वनित करती हुई उडती रहती हैं। पांचों
ज्ञानेन्द्रियों से संबंधित ५ प्रकार के विषय शब्द स्पर्श रूप रस
गन्धात्मक पांच पुष्प बाण हैं। राग अर्थात् आसक्ति रूपी ही वह
पाश है जिससे सारा जगत् बंधा पड़ा है, क्रोध अथवा द्वेष प्रकृति
का अंकुश है, जिससे विद्ध कर मनुष्य कौनसा पाप-कर्म करने को
बाध्य नहीं हो जाता। इस प्रकार पुरुष को पशु के सदृश वश में
रखकर उससे प्रकृति अपने सृष्टि क्रम का कार्य कराती है। भौंरों