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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 129 of 415

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Page 129

सौंदर्य लहरी ८९
न यत्र वाचो न मनो न सत्वं तमो रजो नो महदादयोऽमी
न प्राणबुद्धीन्द्रिय देवतावा न सन्निवेशः खलुलोक कल्पः ।
न स्वप्न जागर्न हितत्सुषुप्तं नखंजलंभूर्निलोऽग्निरर्कः
संसुप्त वच्छून्य वदप्रतर्क्यं तन्मूलभूतं पदमामनन्ति ॥
श्रीमद्भागवत ।
अर्थः— जहां न वाक् शक्ति है, न मन, न सत्व, तमोगु
रजोगु न ये महदादि हैं। न कर्मेन्द्रियों अथवा ज्ञानेन्द्रियों के देवता
हैं और निश्चय ही न लोकों की कल्पना रूपी प्रतीति । न वह स्वप्न
है न जाग्रत और सुषुप्ति, न वहां आकाश, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि
या सूर्य है । सुषुप्तिवत् शून्यवत् अप्रतर्क्य ही व मूल-भूतपद है ।
आहोपुरुषिका पद भगवती के लिये प्रयुक्त किया गया है।
[माया का] आहो आश्चर्य सूचक पद है, और पुरुषिका पुरुष
[बन्धन] का स्त्रीलिंग भाव वाचक पद है। अर्थात भगवती
का रूप आश्चर्यमय है। आत्मा प्रकृति से असंग
है, असंगोऽयमात्मा यह सांख्य वेदान्त का मूल सिद्धान्त है। परन्तु
उपाधि से उस ही में संसारी जीवात्मशक्ति का भी भाव है।
भगवान् ने उसे परा प्रकृति इसी नाते कहा है।
अपरेयमितस्त्वन्यां विद्धि मे प्रकृतिं परां ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ गीता (७,५)
जैसे स्फटिक के ऊपर सन्निधि में आये हुए पदार्थों के रंग
की छाया पडकर उसे अपने रंग से रंजित कर देती है, वैसे ही