सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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पद्धति का साधन रूप का विधान है, तब देह को ही श्री यंत्र माना
जाता है और मंत्रों की सहायता से मूलाधार स्थित कुण्डलिनी शक्ति
का उत्थान कर के उसका आरोहण अवरोहण सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्म
रंध्र (सहस्रार) पर्यन्त किया जाता है। जिसका वर्णन श्लोक ९, १०
एवं ३५ से ४१ तक किया गया है। सब शक्तियां बीज रूप से
अपने शरीर में ही है, उनका जागरण कर के शरीर में ही ईश्वर की
प्राप्ति की जाती है, कहीं बाहिर जाने की आवश्यकता नहीं। पिण्ड
और ब्रह्माण्ड दोनों की रचना तात्विक रूप से एक समान है।
योग मार्गानुसार कुण्डलिनी, मन, प्राण, नाद और विन्दु इन पांचों
के ज्ञान से ब्रह्माण्ड के यावतीय सब तत्वों का ज्ञान होता है।
मूलाधारस्थिता कुण्डलिनी शक्ति ही महामाया कहलाती है, उसही
का संवित् स्वरूप शुद्ध विद्या कहलाता है वह ही परापश्यन्ती मध्यमा
वैखरी के रूप में व्यक्त होकर समस्त मंत्रमय जगत् की सृष्टि करती
है, जिसकी योग उपासना का स्थान मनुष्य देह ही है। कहा हैः—
देहो देवालयः प्रोक्तः।
परन्तु कोई भी विद्या क्यों न हो, उसकी प्राप्ति सद्गुरू
की कृपा के बिना कठिन है।
तद्विद्धि प्रणिप तेन परिप्रश्ने सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति तेज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ गीता ॥
इसलिये तत्वज्ञ महानुभावों की शरण ग्रहण करना ही
राजमार्ग है।