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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

by माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि

DevanagariHindipublished316 pages

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Page 19

[ चार्वाक-
सर्वदर्शनसंग्रहः।
(४)
अङ्गनालिङ्गनादि जन्य सुख ही पुरुषार्थ है । यदि कहो तादृश सुख दुःखाभि-
श्रित होनेसे पुरुषार्थ नही हो सकता यह भी नही, क्योंकि नान्तरीकतया अनिवार्य-
रूपसे प्राप्त दुःखको परित्याग कर सुखमात्रका ग्रहण होता है । जिस प्रकार मत्स्यार्थी
काँटा और छिलका सहित मत्स्योको पकडते हैं परन्तु जितना अंश उपयुक्त हो उतना
लेकर बाकीको छोड देते हैं अथवा जैसे धान्यार्थी सपलाल धान्यको लाकर अपेक्षित
अन्नमात्रको ग्रहण कर बाकी पलालको छोड देते हैं । अत दुःखके डरसे सुखको
छोड देना उचित नही मृगके डरसे धान ही न बोये जाँय, भिक्षुकोंके भयसे पाक भी न
किया जाय ऐसा नही होता । यदि कोई उत्पौक हुए सुखको त्याग दे तो उसको पशुके
समान मूर्ख समझना चाहिए ॥ ७ ॥
तदुक्तम्-“त्याज्यं सुखं विषयसङ्गमजन्म पुंसां
दुःखोपसृष्टमिति मूर्खविचारणेषा ।
व्रीहीन् जिहासति सितोत्तमतण्डुलाढ्यान्
को नाम भोस्तुषकणोपहितान् हितार्थी” ॥ ८ तस्येति-
कहा भी है-विषयभोगसे जायमान सुख दुःखमिश्रित होनेसे त्याज्य हेतद्
का विचार है कौन विचारशील तुषकणोसे आच्छादित होनेके कारण उत्तम
तण्डुलोंसे युक्त धान्यको छोड देगा ॥ ८ ॥
ननु पारलौकिकसुखाभावे बहुवित्तव्ययशरीरायाससाध्ये अग्नि-
होत्रादौ विद्यावृद्धाः कथं प्रवर्त्तिष्यन्ते इति चेत् । तदपि न प्रमा-
णकोटिं प्रवेष्टुमीष्टे अनृतव्याघातपुनरुक्तदोषैर्दूषिततया वैदिकम्म-
न्यैरेव धूर्तवकै परस्परं कर्म्मकाण्डप्रामाण्यवादिभिर्ज्ञानकाण्डस्य
ज्ञानकाण्डप्रामाण्यवादिभिः कर्म्मकाण्डस्य च प्रतिक्षिप्तत्वेन त्रय्या
धूर्त्तप्रलापमात्रत्वेन अग्निहोत्रादेर्जीविकामात्रप्रयोजनत्वात्
तथा चाभाणक -“अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् ।
बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः” ॥ ९ ॥
यदि पारलौकिक स्वर्गादि सुख नही हो तो बहुत धन व्यय एवं शरीरश्रमसा
अग्निहोत्रादि कर्मोमे बडे २ विद्वान् लोग क्यो प्रवृत्त होते हैं यह भी प्रमाण
वीमें प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि वैदिकाभिमानी धूताने ही परस्पर अन
घात, पुनरुक्त, दोषोंमे दूषित किया है जैसे ज्ञानकाण्डप्रामाण्यवादियोंने कर्मक
और कर्मकाण्डमाम्...पादियाने ज्ञानकाण्डको दूषित किया है । नृगूपत्रु