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सर्वकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

१३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हैं, वे ही भव्य ( कल्याणके भागी ) पुरुष भूमण्डलमें विजयी होते—उत्कृष्ट पद पाते हैं । जिनकी बुद्धि उदारता ( परिग्रह-त्याग )-रूपी सौन्दर्य और वैराग्यके रससे रञ्जित हो आनन्दका स्पन्दन करनेवाली है, वे ही उत्तम अभ्यासी कहे गये हैं । जो लोग युक्ति तथा शास्त्रोंके ज्ञाताके द्वारा जाननेमें आनेवाली लौकिक ज्ञेय वस्तुओंके अत्यन्ताभावकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करते हैं, वे ब्रह्माभ्यासी कहे गये हैं। यह दृश्य जगत् सृष्टिके आरम्भमें ही उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिये कभी भी इसका अस्तित्व है ही नहीं। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह मैं ही हूँ—मुझ सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मासे यह भिन्न नहीं है, ऐसे अभ्यासको बोध ( ब्रह्मज्ञान ) का अभ्यास कहा गया है । दृश्यकी उत्पत्ति कभी हुई ही नहीं, इस बोधसे राग-द्वेष आदिका क्षय हो जानेपर ब्रह्मचिन्तनके बलसे उत्पन्न हुई जो परमात्मरति है, वह ब्रह्माभ्यास है। जैसे शरद् ऋतुमें हिमके समान शीतल ओस-जलके अभिषेकसे सब ओर फैला हुआ भारी कुहरा मिट जाता है, उसी प्रकार चित्तमें पूर्वोक्त रीतिसे अभ्यासमें लाये हुए विवेक-बोधरूपी जलके निरन्तर सिञ्चनसे, जो सम्पूर्ण तापोंको शान्त करनेवाला होनेके कारण हिमके समान शीतल है, संसाररूपी कृष्णपक्षकी अँधेरी रातमें उत्पन्न हुई मोहमयी गाढ निद्रा सर्वथा गल जाती (मिट जाती) है।

महर्षि वाल्मीकि कहते हैं—जब मुनिवर वसिष्ठ इस प्रकार यह प्रसङ्ग सुना चुके, तब दिन बीत गया, सूर्य अस्त हो गये, मुनियोंकी वह सभा वसिष्ठजीको नमस्कार करके सायंकालिक कृत्य करनेके लिये चली गयी और रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके साथ ही फिर सभा-स्थानमें आ गयी।

( सर्ग २२ )


सरस्वती और लीलाका ज्ञानदेहके द्वारा आकाशमें गमन और उसका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! वे दोनों श्रेष्ठ देवियाँ सरस्वती और लीला उस आधी रातके समय जब कि समस्त परिजन सो गये थे, पूर्वोक्तरूपसे बातचीत करके अन्तःपुरके मण्डपमें जो मुरझाये नहीं थे, ऐसे फूलोंकी मालारूपी वस्त्रसे ढके हुए राजाके शवके पास ही एक आसनपर बैठ गयीं। वे समाधिमें स्थित हो ऐसी निश्चल हो गयीं मानो रत्नके बने हुए खंभेमें खुदी हुई दो मूर्तियाँ हों अथवा दीवालमें अङ्कित किये गये दो सुन्दर चित्र हों । निर्विकल्प समाधि लग जानेसे वे बाह्यज्ञानसे शून्य हो गयीं । पहले उन दोनोंको 'मैं जगत्' इस भ्रमरूप दृश्यकी अनुत्पत्तिका बोध हुआ, अर्थात् उन्होंने भी अनुभव किया कि जगत्‌की कभी उत्पत्ति हुई ही नहीं । जब ऐसा अनुभव हुआ, तब उन्हें इस दृश्य-प्रपञ्चके अत्यन्ताभावका निश्चयात्मक ज्ञान हो गया । फिर तो उन दोनोंकी दृष्टिसे यह दृश्य-रूपी पिशाच पूर्णतया ओझल हो गया—किसी आड़में छिप गया हो, ऐसी बात नहीं । उसकी सत्ता है ही नहीं, इसलिये वह सर्वथा अदृश्य हो गया । निष्पाप रघुनन्दन ! जैसे हमलोगोंकी दृष्टिमें खरगोशके सींग नहीं हैं और न होनेके कारण ही वे दीखते नहीं, उसी तरह यह दृश्य-पिशाच न होनेके कारण ही उनके लिये सर्वथा तिरोहित हो गया । जो वस्तु पहलेसे ही नहीं है, वह वर्तमानमें भी अस्तित्वशून्य ही है । इस जगत्‌की यही स्थिति है । यह प्रतीत हो तो मृगतृष्णामें जलकी प्रतीतिके समान असत् है और यदि प्रतीत न हो तो खरगोशके सींगकी भाँति असत् है । तात्पर्य यह कि किसी भी दशामें इसकी सत्ता नहीं है ।

ज्ञानकी देवी सरस्वती अपने उसी ज्ञानमय शरीरसे विचरण करने लगीं । परंतु मानवी रानी लीलाने मानव-देहके अभिमानका त्याग करके ध्यान और ज्ञानके अनुरूप दिव्य शरीरका आश्रय ले उसीके द्वारा तीव्र गतिसे आकाशमें विचरना आरम्भ किया । उन दोनोंने उद्बुद्ध