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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 68 of 81

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सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा ( ५३ )
श्रीहरिः शरणम्
सांख्य, न्याय और वैशेषिक
दर्शन का जीवात्मा
( सांख्य )
सांख्यदर्शन में आत्मा को किस प्रकारका माना गया है,
इस प्रश्न के सम्बन्ध में जितनी बातें उस दर्शन में बताई गई
हैं या स्वीकार की गई हैं, नीचे दिखाई जाती हैं-
१
सांख्यशास्त्र के आचार्य कहते हैं कि-आत्मामें सत्व, रजस्
तथा तमोगुण नहीं है। प्रधान या प्रकृति से बिलकुल भिन्न है
न प्रकृति या उसके महत्तत्व आदि कार्यों का उसमें कोई अंश
सम्मिलित है, और न आत्मा ही का उनमें है। सर्वसाधारण
का वह विषय नहीं है, किन्तु योग सम्पन्न या तत्वज्ञ पुरुषही
उसे जान सकते हैं। चेतन है। सरूप या अपने समान तथा
अपने से विजातीय परिणाम से रहित है, अर्थात् वह किसी कार्यको
उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि-मृत्तिका घट, शराव आदि अनेक
कार्यों को उत्पन्न करती रहती है।
उपर्युक्त सब धर्म ऐसे हैं, जो प्रकृति या उसके कार्यों में
(महत्तत्व अहंकार, मन, चक्षुः, श्रोत्र, घ्राण, रसन, त्वक्, वाक्
हस्त, पाद्, गुदं, उपस्थ, (लिङ्ग या योनि) शब्द, स्पर्श, रूप,
रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी में) नहीं
रहते हैं।
१-हेतुमदनित्यमव्यापि, सक्रियमनेकममाश्रितं लिङ्गम् ।
सावयवं परतन्त्रं, व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ त्रिगुणमविवेकि
विषयः सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि। व्यक्तं तथा प्रधानं, तद्विप-
रीतस्तथाच पुमांन् ॥
• (सां० त० कौ० श्लोक १०, ११ )