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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 55 of 81

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( ४० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती
है इसीसे मदालसा के पुत्र अति बालक होने पर भी माता के
उपदेश मात्र से ही विवेक-ख्यातिको प्राप्त हुये और मुक्त भी।
उस में भाग्य ही कारण था, किन्तु और कुछ नहीं। इस उप-
देश से जो भाग्य में तुष्टि है वह भाग्य (वृष्टि) कहलाती है।
जो तुष्टियें प्रकृति, महत्‌तत्व, अहंकार आदि अनात्म
वस्तुओं को आत्मा समझ कर वैराग्य से होजाती हैं, वे सब
बाह्य तुष्टियें हैं। क्योंकि-आत्म-ज्ञान के न होने की अवस्था
ही में वे अनात्म ( बाह्य ) वस्तु के अवलम्बन से होती हैं।
इन तुष्टियों का कारण वैराग्य है, और वह वैराग्य ५ कारणों
से होता है, अतः वह पांच प्रकार का समझा जाता है; तथा
उसके कारण ही उस से होने वाली तुष्टियें भी ५ ही मानी
जाती हैं। अर्थात्-भोग्य विषय शब्द आदि ५ हैं, और उनके
उपरम (वैराग्य) भी ५ हैं। विषय की संख्या के समान इस
के कारण भी (१) अर्जन (२) रक्षण (३) क्षय (४) भोग
(५) हिंसा, ये पांच हैं, इससे भी वैराग्य या उपरम ५ हैं।
इनकी विशेष व्याख्या इस प्रकार है—
(क) [ अर्जन ] धनके अर्जन या संग्रह करनेके उपाय सेवा
आदि हैं, जो सेवक आदि को दुःखित करने वाले हैं। क्यों
कि-सेवा में क्रोधी स्वामी से कभी २ थप्पड़ या गर्दना
आदि भी खाना पड़ता है। सुतराम् इन दुःखों को अनुभव
करने वाले बुद्धिमान् उसमें प्रवृत्त नहीं होते। इसी प्रकार अन्य
उपायों में भी दोष हैं, इस प्रकार जो विषयसे उपरम तुष्टि है
वह 'पार' कहलाती है।
(ख) [ रक्षण ] धन किसी प्रकार इकट्ठा हो भी गया, तो
उसके राजा, चोर, अग्नि जलप्रवाह आदि से नांश होजाने की