सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिन्दी सांख्य दर्शन ( ३६ )
त्कार के लिये असत् उपदेश से सन्तुष्ट होकर जो पुरुष यत्न
• नहीं करता, उसको ये चार आध्यात्मिक्री तुष्टियें होती हैं ।
क्योंकि-ये तुष्टियें प्रकृति से भिन्न आत्मा को लेकर होती हैं
इसी से ये आध्यात्मिक्री हैं। इन की विशेष व्याख्या इस
प्रकार है कि-
(क) किसी ने किसी को उपदेश दिया कि- विवेक साक्षा-
त्कार ( प्रकृति और आत्माके भेद को अपने अनुभवमें लाना )
प्रकृति का ही परिणाम विशेष है, अतः उसे प्रकृति स्वयम् ही
करदेगी इससे तुझे ध्यान का अभ्यास नहीं करना चाहिये
हे वत्स ! तू इसी प्रकार रह । सो यह उस शिष्यको जो प्राकृ-
ती (प्रकृति पर निर्भरता ) तुष्टि होती है उसका नाम 'प्रकृति'
( अम्भः ) ही है ।
(ख) [ दूसरा उपदेश ] यद्यपि वह विवेकख्याति प्रकृति
से होती है, तथापि केवल प्रकृति से ही नहीं । क्योंकि-यदि
प्रकृति से ही विवेक-ख्याति या तत्वज्ञान हो तो उस को सब
के प्रति समान होनेके कारण सबको सब कालमें विवेकख्याति
होना चाहिये? इस कारण हे वत्स ! तू संन्यास धारण कर ।
संन्यास से तुझे वह ख्याति प्राप्त होगी। इस उपदेश से जो
शिष्य को तुष्टि होती है, वह उपादान ( सलिल ) कह-
लाती है ।
(ग) [ तीसरा उपदेश ] यद्यपि संन्याससे निर्वाण (मुक्ति)
होती है, किन्तु तत्काल नहीं, अर्थात् वही संन्यास तुझे काल
पाकर सिद्धि देगा, अतः तू उतावला मत हो, इस उपदेश से
जो काल में तुष्टि होती है वह काल कहलाती है, दूसरा नाम
इसका मेघ है ।
• (घ) [ चौथा उपदेश ] विवेक-ख्याति को न काल कर