Skip to content
SarvaKosh
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 48 of 81

Read in context
Page 48

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३३ )
कार शरीरों की दुर्लभता नहीं है ॥४२॥
निमित्त और नैमित्तिक का विभाग ।
सांसिद्धिकाश्चभावाःप्राकृतिकावैकृताश्चधर्माद्या ।
दृष्टाःकरणाश्रयिणः कार्याश्रयिणश्चकललाद्याः॥४३॥
धर्म आदि भाव दो प्रकार के होते हैं, प्राकृतिक और
वैकृतिक । प्राकृतिक सांसिद्धिक या स्वाभाविक कहे जाते हैं
जैसे-सृष्टिके आदि कालमें भगवान् कपिलदेव महामुनि जन्म
से ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य युक्त प्रकट हुये । इन
में धर्म आदि जो भाव थे वे स्वाभाविक थे । और जो किसी
देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न होते हैं, वे वैकृ-
तिक असांसिद्धिक या अस्वाभाविक कहे जाते हैं । जैसे-प्राचेतस
आदि महर्षियोंको धर्म आदिकी प्राप्तिहुई । ये भाव करणों में
या इन्द्रियसम्मूहरूप लिङ्ग शरीर में रहते हैं ॥ षाट्कौशिक
शरीर की गर्भ में कलल, बुद्बुद, मांस-पेशी, अङ्ग प्रत्यङ्ग व्यूह
आदि अवस्थायें होतीहैं । तथा गर्भसे बाहर निकले हुये स्थल
शरीर की बाल्य, कौमार, यौवन और बुढापा अवस्थाएं होती
हैं । ( भावोंका विभाग निमित्त विभाग है और शरीरों का
विभाग नैमित्तिक विभाग है )
गौड़पाद यहां भावों के तीन भेद मानते हैं-सांसिद्धिक,
प्राकृत, और वैकृत । इनके उदाहरण में आदि विद्वान् कपिल
सनकादि और अस्मदादि हैं इस मतमें सांसिद्धिक स्वाभाविक
प्राकृत देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न और वैकृत
अध्ययन से उत्पन्न हैं ॥४३॥
किस निमित्त का कौन नैमित्तिक है ।
धर्मेणगमनमूर्ध्वंगमनमधस्ताद्भवत्यधर्मेण ।