सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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लिङ्ग शरीर सृष्टि के आदि काल में प्रधान से प्रतिपुरुष
अलग २ उत्पन्न किया गया है । असक्त है, अर्थात्-शिलामें भी
प्रवेश कर जाता है । नियत या महाप्रलय तक ठहरने वाला है
१-महत्तत्व १-अहंकार १-मन ५-ज्ञानेन्द्रियें ५-कर्मेन्द्रियें और
५ तन्मात्र कुल १८ तत्वों का समूहरूप है । षाट्कौशिक ( ६
कोशों के समूहरूप ) स्थूल शरीरके बिना अकेला भोगका स्थान
नहीं बन सकता, और धर्म अधर्म आदि ८ भावों की वासना
से युक्त होनेके कारण संसरण करता है ( पूर्व २ शरीरको छोड़र
कर नये २ शरीरकी धारण करता है) ॥ ४० ॥
लिङ्ग शरीर को स्थूल शरीर की अपेक्षा ।
चित्रंयथाश्रयमृते स्थाण्वादिभ्योविनायथाच्छाया।
तद्वद् विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥४१॥
जिस प्रकार आश्रय (दीवार आदि) के बिना और छाया
वृक्ष आदि के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार स्थूल शरीर
के विना लिङ्ग शरीर नहीं रहता ( यहां तक कि-मृत्युके पश्चात्
दूसरे शरीर के ग्रहण करने से पहिले उस अवान्तर में भी
तात्कालिक अदृष्टनिर्मित एक पाञ्चभौतिक शरीर उसे मिल
जाता है सर्वथा वह निराश्रय नहीं रहता) ॥४१॥
लिङ्ग शरीर की संसृति का प्रकार और कारण ।
पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसंगेन ।
प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद्व्यवतिष्ठतेलिङ्गम् ॥४२॥
पुरुषार्थ (जीवों के अदृष्ट) की प्रेरणा से युक्त होकर यह
लिङ्ग शरीर धर्म, अधर्म और षाट्कौशिक शरीर के सम्बन्धसे
नटके समान नानारूप ( मनुष्यदेव तिर्यक्रूप) से व्यव-
स्थित होता है । प्रकृतिके विभुत्व (महिमा) से उसे विलक्ष-