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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

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(२४) हिन्दी सांख्य दर्शन
गया है कि-संयोगवंश प्रत्यक्ष विषय में कभी चारों ज्ञान एक
साथ होजाते हैं और कभी क्रमसे ही। जैसे-गाढ़ी अँधियारी
रात्रि में कोई मनुष्य वन में जाता है, और उसे बिजली के
प्रकाश के साथ साम्ने ने कोई व्याघ्र अचानक दिखाई दे, वहां
उसे सामान्य, विशेष, अभिमान और अध्यवसाय चारों ज्ञान
एक ही साथ हो जाते हैं और वह एक साथ ही पीछे हटता
है। ऐसे ही क्रमका उदाहरण मन्द अन्धकारमें लीजिये। पहिले
मनुष्य को उसमें 'कुछ है '-ऐसा सामान्य ज्ञान होता है जो
नेत्ररूप बाह्यइन्द्रिय का व्यापार है। और फिर टकटकी
लगाकर देखने से 'धनुषबाण साधे हुये कोई चोर है, मुझे मा-
रना ही चाहता है,-ऐसा प्रतीत होता है, यह विशेष ज्ञान
मनका व्यापार है। फिर उसे अभिमान होता है कि-मैं यहां
से हट सकता हूं, यह अहंकारका व्यापार है। और फिर इसी
प्रकार वह अध्यवसाय करता है कि-मैं यहांसे हटू, यह बुद्धि
का व्यापार है ॥ यह प्रत्यक्ष विषय में चारों इन्द्रियोंकी वृत्ति
का क्रम और अक्रम हुआ । और जहां बाह्यइन्द्रिय नेत्र आदि
का वस्तु से उचित सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् जानने योग्य वस्तु
भूतकाल में है, या भविष्यत् कालमें है,या अतिदूर आदि होने
के कारण वह दुर्ज्ञेय है, वहां तीन अन्तःकरणों (भीतरी-
इन्द्रिय मन आदिकों) का ही व्यापार होता है किन्तु नेत्र
आदि का नहीं । विशेष यह है कि-जिस विषय पर मन
आदिको जाना है वह पहिले बाह्य इन्द्रियसे कभी अनुभव कर
लिया गया हो, तभी उस विषय का उन से ज्ञान होता है,
अन्यथा नहीं । जैसे किसी ने पहिले राजा का दर्शन किया है,
उसी को कालान्तर में उसका मनसे स्मरण होता है। जिसने
राजा को देखा नहीं उसे उसका स्मरण भी होता नहीं। इस