सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिन्दी सांख्य दर्शनं ( २१ )
ज्ञानेन्द्रियें और कर्मेन्द्रियें ।
बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि ।
वाक्पाणिपादपायूपस्थाः कर्मेन्द्रियाण्याहुः ॥२६॥
( क ) ज्ञानेन्द्रियें-चक्षु ( नेत्र ) श्रोत्र ( कान ) घ्राण
( नाक ) रसन ( जिह्वा ) त्वक् ( त्वचा या चर्म ) ।
( ख ) कर्मेन्द्रियें-वाक् ( वाणी ) हस्त, पाद, पायु (गुद)
उपस्थ ( लिङ्ग या योनि ) ॥
इन्द्र नाम आत्मा ( पुरुष ) का है, उसके जनाने वाले
होने से या उसके सम्बन्ध से ये ( इन्द्रिय ) कहलाते हैं ।
इन इन्द्रियों के पृथक् २ लक्षण इनके कार्य से ही हैं। जैसे-
रूपका ग्रहण कराने वाला इन्द्रिय चक्षु है । शब्द का ग्रहण
कराने वाला श्रोत्र, गन्धका ग्रहण कराने वाला घ्राण, रस का
ग्रहण कराने वाला रसन, और स्पर्शका ग्रहण कराने वाला
त्वक् इन्द्रिय है। कर्मेन्द्रियों के लक्षण उनके कार्यों से जानने
चाहियें, जो २८ वीं कारिका में कहे जावेंगे ॥ २६ ॥
ग्यारहवां इन्द्रिय ( मन ) ।
उभयात्मकमत्रमनः संकल्पकमिन्द्रियं च साधर्म्यात्
गुणपरिणामविशेषात्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥
(क) इन इन्द्रियोंमें मन उभयात्मक अर्थात्-ज्ञानेन्द्रियं
और कर्मेन्द्रियरूप है । क्योंकि-वह दोनों प्रकार की इन्द्रियों
की प्रवृत्तिको कल्पित करता है ।
(ख) संकल्प मनका असाधारण धर्म या लक्षण है। संकल्प,
नाम समीचीन कल्पना या विशेष कल्पना का है। अर्थात्-पहिले
अन्य इन्द्रियोंसे सामान्यरूप से ज्ञान होना है, जैसे 'यह कुछ
बस्तु है' फिर उसी में विशेषण की कल्पना होती है, कि-यह