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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 30 of 81

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हिन्दी सांख्य दर्शन (१५)

साक्षी है। क्योंकि अचेतन विषय को विषय नहीं दिखाया
जासकता। इस कारण चेतन और अविषय होने से पुरुष सा-
क्षी औरद्रष्टा होता है। एवम् त्रिगुण रहित होने से ही वह
दुःखत्रय से रहित है। अर्थात् सत्व आदि गुण ही सुख दुःख
आदि रूप हैं, और वे उसमें हैं नहीं अतएव वह दुःखमात्र
से रहित है तथा दुःखत्रय का अभाव ही कैवल्य या
मोक्ष का स्वरूप है, अतः अत्रिगुण होने से उस का कैवल्य
सिद्ध होता है। इसी प्रकार अत्रिगुण होने से ही यह मध्यस्थ
या उदासीन है। क्योंकि सुखी सुख से तृप्त होता हुवा और
दुःखी दुःख से द्वेष करताहुआ मित्रशत्रु की कक्षा में आजाता है,
किन्तु.मध्यस्थ नहीं होता। सुतराम् आत्मा सत्व आदि गुणों से
रहित होने के कारण सुख दुःख से भी रहित है, और अतएव
वह मध्यस्थ या उदासीन है। ऐसे ही विवेकी और अप्रसव-
धर्मी होने से वह अकर्ता है। प्रयोजन यह है कि- क्रिया जिस
में होती है, वह कारक होता है, और क्रिया सब परिच्छिन्न
(परिमित) वस्तु में होती है। परिमित वस्तु महत्तत्व से
आरम्भ करके प्रकृति के सकल कार्य हैं। आत्मवस्तु व्यापक
(विभु) है, उसमें क्रिया का संभव नहीं, अतः वह अकर्ता है
अकर्ता पद से कर्त्ताके साथ करण, सम्प्रदान आदि अन्य का-
रकों का भी निषेध समझना चाहिये। कारण वे कारक भी
क्रिया के सम्बन्धसे ही होते हैं। यहां 'प्रसव' नाम कार्य मात्र
का है। कार्य पद में प्रकृति और पुरुष दोनों से अतिरिक्त
सकल जड़समूहं आता है, उन्हीं में चलन आदि क्रियायें भी हैं
जबकि आत्मा अप्रकृति है, तो उससे कोई कार्य होना संभव
नहीं, अतः वह अप्रसवधर्मी होने से अकर्ता है, इसी प्रकार
'विवेकी' विशेषण भी उसे अकर्त्ताही सिद्ध करता है। क्योकि
हमारी समझ में 'विवेकी' नाम यहां विविक्त या अलग रहने