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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 28 of 81

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हिन्दी सांख्य दर्शन ( १३ )
४ था हेतु यह है कि महत्‌तत्व और शरीर आदि, जितने
प्रकृति से उत्पन्न हुये संसार में पदार्थ हैं, वे सब सुख, दुःख
और मोह रूप हैं, अतः सुख को अनुकूलनीय या सुखी करने
के लिये, दुःख को प्रतिकूलनीय या दुःखित करने के लिये,
तथा मोह को मोहित करने के लिये दूसरे २ की अपेक्षा
होती है। क्योंकि-सुख आदि सुख आदि को ही सुखित
दुःखित तथा मोहित नहीं कर सकता । सुतराम् उन से
विलक्षण सुखी आदि होने वाला दूसरा पदार्थ (पुरुष)
सिद्ध होता है।
५वां हेतु सब से अधिक या बलवान यह है कि शास्त्र
कैवल्य या मोक्ष को प्रतिपादन करते हैं, और महापुरुष उस
के लिये यत्न करते आये हैं। यदि संघात ही संघात है, तो
फिर उस से अलग होने की इच्छा किस को हो और उससे
वह अलग हो भी कैसे सकता है। सुतराम्-आत्मा संघात से
अलग पदार्थ है ॥ १७ ॥
पुरुष (आत्मा) बहुत हैं।
पुरुष है,-यह प्रतिपादन किया गया, अब यह प्रश्न है
कि-क्या वह पुरुष सब शरीरों में एक है, या प्रति शरीर
अलग २ ? इस के उत्तर में प्रति शरीर पुरुष अलग २ है, यह
प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं—
जननमरणकरणानां प्रतिनियमाद् युगपत्प्रवृत्तेश्च
पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥
पुरुष (आत्मा) बहुत हैं। क्योंकि-
(क) जन्म, मरण, और इन्द्रियें प्रति पुरुष अलग २ हैं।
(ख) सब पुरुष एक साथ एक कर्म में नहीं लगते।
(ग) और भिन्न २ पुरुषों में सत्व आदि तीनों गुण