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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

by स्वामी रामसुखदास

Source: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (origin)

DevanagariHindipublished1,299 pages

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्राक्कथन

वंशीधरं तोत्त्रधरं नमामि मनोहरं मोहहरं च कृष्णम्।
मालाधरं धर्मधुरन्धरं च पार्थस्य सारथ्यकरं च देवम्॥
कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिं च।
ददाति गीता करुणार्द्रभूता कृष्णेन गीता जगतो हिताय॥
संजीवनी साधकजीवनीयं प्राप्तिं हेरैवं सरलं ब्रवीति।
करोति दूरं पथविघ्नबाधां ददाति शीघ्रं परमात्मसिद्धिम्॥*

गीताकी महिमा

श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा अगाध और असीम है। यह भगवद्गीताग्रन्थ प्रस्थानत्रयमें माना जाता है। मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये तीन राजमार्ग 'प्रस्थानत्रय' नामसे कहे जाते हैं—एक वैदिक प्रस्थान है, जिसको 'उपनिषद्' कहते हैं; एक दार्शनिक प्रस्थान है, जिसको 'ब्रह्मसूत्र' कहते हैं और एक स्मार्त प्रस्थान है, जिसको 'भगवद्गीता' कहते हैं। उपनिषदोंमें मन्त्र हैं, ब्रह्मसूत्रमें सूत्र हैं और भगवद्गीतामें श्लोक हैं। भगवद्गीतामें श्लोक होते हुए भी भगवान्की वाणी होनेसे ये मन्त्र ही हैं। इन श्लोकोंमें बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ होनेसे इनको सूत्र भी कह सकते हैं। 'उपनिषद्' अधिकारी मनुष्योंके कामकी चीज है और 'ब्रह्मसूत्र' विद्वानोंके कामकी चीज है; परन्तु 'भगवद्गीता' सभीके कामकी चीज है।

भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ है। इसमें साधकके लिये उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, चाहे वह किसी भी देशका, किसी भी वेशका, किसी भी समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो। इसका कारण यह है कि इसमें किसी समुदाय-विशेषकी निन्दा या प्रशंसा नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्वका ही वर्णन है। वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) वह है, जो परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा अतीत और सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें नित्य-निरन्तर एकरस-एकरूप रहनेवाला है। जो मनुष्य जहाँ है और जैसा है, वास्तविक तत्त्व वहाँ वैसा ही पूर्णरूपसे विद्यमान है। परन्तु परिवर्तनशील प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्तियोंमें राग-द्वेषके कारण उसका अनुभव नहीं होता। सर्वथा राग-द्वेषरहित

होनेपर उसका स्वतः अनुभव हो जाता है।

भगवद्गीताका उपदेश महान् अलौकिक है। इसपर कई टीकाएँ हो गयीं और कई टीकाएँ होती ही चली जा रही हैं, फिर भी सन्त-महात्माओं, विद्वानोंके मनमें गीताके नये-नये भाव प्रकट होते रहते हैं। इस गम्भीर ग्रन्थपर कितना ही विचार किया जाय, तो भी इसका कोई पार नहीं पा सकता। इसमें जैसे-जैसे गहरे उतरते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे इसमेंसे गहरी बातें मिलती चली जाती हैं। जब एक अच्छे विद्वान् पुरुषके भावोंका भी जल्दी अन्त नहीं आता, फिर जिनका नाम, रूप आदि यावन्मात्र अन्त है, ऐसे भगवान्के द्वारा कहे हुए वचनोंमें भरे हुए भावोंका अन्त आ ही कैसे सकता है ?

इस छोटे-से ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय मिलते हैं। हेरक दर्शनके अलग-अलग अधिकारी होते हैं, पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब इसके अधिकारी हैं।

भगवद्गीतामें साधनोंका वर्णन करनेमें, विस्तारपूर्वक समझानेमें, एक-एक साधनको कई बार कहनेमें संकोच नहीं किया गया है, फिर भी ग्रन्थका कलेवर नहीं बढ़ा है। ऐसा संक्षेपमें विस्तारपूर्वक यथार्थ और पूरी बात बतानेवाला दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं दीखता। अपने कल्याणकी उत्कट अभिलाषावाला मनुष्य हेरक परिस्थितिमें परमात्मतत्त्वको

  • 'जो अपने हाथोंमें वंशी तथा चाबुक और गलेमें दिव्य माला धारण किये हुए हैं एवं जो प्राणियोंके मनका तथा मोहका हरण करनेवाले हैं, उन पार्थसारथि धर्मधुरन्धर दिव्यस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।'

'भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा गायी हुई करुणार्द्रभूता गीता जगत्के हितके लिये कर्तव्यकी दीक्षा, समताकी शिक्षा, ज्ञानकी भिक्षा और शरणागतिका तत्त्व प्रदान करनेवाली है।'

'परमात्मप्राप्तिको सरल बनानेवाली और साधकोंका जीवन यह 'साधक-संजीवनी' साधन-पथकी विघ्न-बाधाओंको दूर करके शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप परमसिद्धिको प्रदान करनेवाली है।'