ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 994 of 1855
Read in contextहे इंद्र और पूषा! आज हम अपनी भलाई के लिए, तुम्हारी मित्रता एवं अन्न पाने के लिए
तुम्हें बुलाते हैं. (१)
सोममन्य उपासदत्पातवे चम्वोः सुतम्. करम्भमन्य इच्छति.. (२)
हे इंद्र व पूषा! तुम में से एक अर्थात् इंद्र चमस में निचुड़े हुए सोमरस पीने के लिए जाते
हैं तथा दूसरे अर्थात् पूषा जौ का सत्तू खाना चाहते हैं. (२)
अजा अन्यस्य वह्नयो हरी अन्यस्य सम्भृता. ताभ्यां वृत्राणि जिघ्नते.. (३)
हे पूषा एवं इंद्र! तुम में से पहले को बकरे खींचते हैं एवं दूसरे को दो मोटेताजे घोड़े. इंद्र
उन्हीं घोड़ों की सहायता से वृत्र को मारते हैं. (३)
यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः. तत्रा पूषाभवत्सचा.. (४)
जब अधिक वर्षा करने वाले इंद्र गतिशील महाजल बरसाते हैं, तब पूषा उनके सहायक
बनते हैं. (४)
तां पूष्णः सुमतिं वयं वृक्षस्य प्र वयामिव. इन्द्रस्य चा रभामहे.. (५)
जैसे कोई पेड़ की मजबूत डाल पर बैठता है, उसी प्रकार हम इंद्र एवं पूषा की कृपा का
सहारा लेते हैं. (५)
उत्पूषणं युवामहेऽभीशूँरिव सारथिः. मह्या इन्द्रं स्वस्तये.. (६)
हम पूषा एवं इंद्र को अपने महान् कल्याण के लिए उसी प्रकार अपने पास बुलाते हैं,
जैसे सारथि लगाम खींचता है. (६)
सूक्त—५८ देवता—पूषा
शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि.
विश्वा हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु.. (१)
हे पूषा! तुम्हारा शुक्लवर्णरूप अर्थात् दिन अलग है एवं कृष्णवर्णरूप अर्थात् रात
अलग है. रात-दिन परस्पर भिन्न रूप वाले हैं. तुम सूर्य के समान तेजस्वी हो. हे अन्नस्वामी
पूषा! तुम सब ज्ञानों को धारण करते हो. तुम्हारा दान कल्याणकारी हो. (१)
अजाश्वः पशुप्रा वाजपस्त्यो धियञ्जिन्वो भुवने विश्वे अर्पितः.
अष्ट्रां पूषा शिथिरामुद्धरीवृजत् सञ्चक्षाणो भुवना देव ईयते.. (२)
बकरेरूप घोड़ों वाले, पशुपालक, अन्नपूर्ण घर वाले, स्तोताओं को प्रसन्न करने वाले एवं
ebook converter DEMO Watermarks*