ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 993 of 1855
Read in contextआजासः पूषणं रथे निशृम्भास्ते जनश्रियम्. देवं वहन्तु बिभ्रतः.. (६)
रथ में जुड़े हुए बकरे स्तोताओं के आधार पूषा को रथ में धारण करते हुए यहां लावें.
(६)
सूक्त—५६ देवता—पूषा
य एनमादिदेशति करम्भादिति पूषणम्. न तेन देव आदिशे.. (१)
जो पूषा को घी मिले हुए जौ के सत्तू खाने वाला कहकर स्तुति करता है, उसे अन्य
देवता की स्तुति नहीं करनी पड़ती. (१)
उत घा स रथीतमः सख्या सत्पतिर्युजा. इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते.. (२)
रथस्वामियों में श्रेष्ठ एवं सज्जनों के पालक पूषा देव से मिलकर इंद्र शत्रुओं को मारते
हैं. (२)
उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम्. न्यैरयद्रथीतमः.. (३)
प्रेरक एवं रथस्वामियों में श्रेष्ठ पूषा सूर्य के सोने से बने रथ का पहिया भली प्रकार
चलाते हैं. (३)
यदद्य त्वा पुरुष्टुत ब्रवाम दस्र मन्तुमः. तत्सु मो मन्म साधय.. (४)
हे बहुतों द्वारा स्तुत, दर्शनीय एवं ज्ञानसंपन्न पूषा! जिस धन-प्राप्ति के उद्देश्य से हम
तुम्हारी स्तुति करते हैं, उसी धन को हमें दो. तुम प्रसिद्ध हो. (४)
इमं च नो गवेषणं सातये सीषधो गणम्. आरात् पूषन्नसि श्रुतः.. (५)
हे पूषा! इन गायों के अभिलाषी लोगों को गायों का समूह प्राप्त कराओ. तुम दूर देश में
प्रसिद्ध हो. (५)
आ ते स्वस्तिमीमह आरे अघामुपावसुम्. अद्या च सर्वतातये श्वश्च सर्वतातये.. (६)
हे पूषा! हम आज और कल के यज्ञों की पूर्ति के लिए तुम्हारी रक्षा चाहते हैं. तुम्हारी
रक्षा पापरहित एवं धनयुक्त होती है. (६)
सूक्त—५७ देवता—इंद्र व पूषा
इन्द्रा नु पूषणा वयं सख्याय स्वस्तये. हुवेम वाजसातये.. (१)
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