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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 981 of 1855

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Page 981

कामों को पूरा करें. (८)
प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं सुगभस्तिमृभ्वम्.
होता यक्ष्यजतं पस्त्यानामग्निस्त्वष्टारं सुहवं विभावा.. (९)
देवों को बुलाने वाले एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि सबके प्रथम विभागकर्त्ता, प्रसिद्धि एवं अन्न-
धारण करने वाले, सुंदर हाथों वाले, दानशील, शोभन-बाहुओं वाले, भासमान, गृहस्थों द्वारा
यजनीय एवं सुखपूर्वक बुलाने योग्य त्वष्टा का यज्ञ करें. (९)
भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ.
बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्नमृधग्घुवेम कविनेषितासः.. (१०)
हे स्तोता! इन स्तोत्रों द्वारा रात-दिन लोकपालक रुद्र की वृद्धि करो. हम बुद्धिमान् रुद्र
द्वारा प्रेरित होकर महान्, दर्शनीय, जरारहित एवं शोभन-सुख वाले रुद्र का हवन समृद्धि के
साथ करें. (१०)
आ युवानः कवयो यज्ञियासो मरुतो गन्त गृणतो वरस्याम्.
अचित्रं चिद्धि जिन्वथा वृधन्त इत्था नक्षन्तो नरो अङ्गिरस्वत्.. (११)
हे अतिशय युवा, ज्ञानसंपन्न एवं यज्ञपात्र मरुतो! तुम यजमान की सुंदर स्तुति के समीप
आओ. हे नेताओ! तुम इस प्रकार वृद्धि पाकर एवं गतिशील किरणों के समान व्याप्त होकर
विलक्षण वृक्षों वाले स्थान को वर्षा द्वारा सींचो. (११)
प्र वीराय प्र तवसे तुरायाजा यूथेव पशुरक्षिरस्तम्.
स पिस्पृशति तन्वि श्रुतस्य स्तृभिर्न नाकं वचनस्य विपः.. (१२)
हे स्तोता! अतिशय वीर, शक्तिशाली एवं गतिशील मरुतों के लिए इस प्रकार स्तुति
करो, जिस प्रकार ग्वाला पशुओं को हांकता है. आकाश में जिस प्रकार तारे होते हैं, उसी
प्रकार मरुद्गण बुद्धिमान् स्तोता की सुनने योग्य स्तुतियों को अपने शरीर पर धारण करें.
(१२)
यो रजांसि विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुर्मनवे बाधिताय.
तस्य ते शर्मन्नुपदद्यमाने राया मदेम तन्वा३ तना च.. (१३)
हे स्तोता! जिन विष्णु ने कष्ट में पड़े मनु के कल्याण के निमित्त तीनों लोकों को तीन
चरणों के द्वारा नाप लिया था, वह ही तुम्हारी यज्ञशाला में दिव्यस्थान में निवास करें एवं हम
पुत्र-पौत्रों सहित धन से प्रसन्न हों. (१३)
तन्नोऽहिर्बुध्न्यो अद्भिर्कैस्तत्पर्वतस्तत्सविता चनो धात्.
तदोषधीभिरभि रातिषाचो भगः पुरन्धिर्जिन्वतु प्र राये.. (१४)
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