ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपरो हि मर्त्यैरसि समो देवैरुत श्रिया.
अभि ख्यः पूषन् पृतनासु नस्त्वमवा नूनं यथा पुरा.. (१९)
हे पूषा! तुम धन के द्वारा मनुष्यों से ऊंचे एवं देवों के समान हो. युद्धों में हमारी ओर
कृपादृष्टि रखना. प्राचीन काल के समान ही तुम इस समय हमारी रक्षा करना. (१९)
वामी वामस्य धूतयः प्रणीतिरस्तु सूनृता.
देवस्य वा मरुतो मर्त्यस्य वेजानस्य प्रयज्यवः.. (२०)
हे कंपाने वालो एवं यज्ञपात्र मरुतो! तुम्हारी जो सत्यरूपी एवं धन की प्रेरणा देने वाली
वाणी यजमानों को मनचाहा धन देती है, वही वाणी हमारी मार्ग-दर्शिका बने. (२०)
सद्याश्चिद्यस्य चर्कृतिः परि द्यां देवो नैति सूर्यः.
त्वेषं शवो दधिरे नाम यज्ञियं मरुतो वृत्रहं शवो ज्येष्ठं वृत्रहं शवः.. (२१)
जिन मरुतों के असीमित कार्य सूर्य के समान आकाश में विस्तृत हो जाते हैं, वे दीप्त,
यज्ञ के योग्य एवं शत्रुनाशक बल धारण करते हैं. उनका शत्रुनाशक बल सबसे उत्तम है. (२१)
सकृद्ध द्यौरजायत सकृद्भूिमरजायत. पृश्न्या दुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते..
(२२)
एक बार स्वर्ग उत्पन्न हुआ. एक ही बार धरती बनी. मरुतों की माता पृश्नि से एक बार
दूध काढ़ा गया. इसके बाद कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ. (२२)
सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव
स्तुषे जनं सुव्रतं नव्यसीभिर्गीर्भिर्मित्रावरुणा सुम्नयन्ता.
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्तु सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निः.. (१)
मैं नई स्तुतियों द्वारा शोभन-कर्म वाले देवों की प्रशंसा करता हूं. मैं स्तोताओं के सुख
की अभिलाषा करने वाले मित्र व वरुण की स्तुति करता हूं. शोभनबलसंपन्न मित्र, वरुण एवं
अग्नि यहां आवें और मेरी स्तुतियां सुनें. (१)
विशोविश ईड्यमध्वरेष्वदृप्तक्रतुमर्तिं युवत्योः.
दिवः शिशुं सहसः सूनुमग्निं यज्ञस्य केतुमरुषं यजध्यै.. (२)
मैं समस्त प्रजाओं के यज्ञों में स्तुति के योग्य, दर्परहित कर्म वाले, स्वर्ग एवं धरती के
स्वामी, स्वर्ग एवं शक्ति के पुत्र व यज्ञ के केतु अग्नि का यज्ञ करने के लिए यजमान की प्रेरणा
देता हूं. (२)
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